मैं तुझे फूल कहूँ और कहूँ भंवरो से

आओ उस फूल का रस चूस के नाचो-झूमो
मैं तुझे शम्अ'' कहूँ और कहूँ परवानो
आओ उस शम्अ'' के होंटों को ख़ुशी से चूमो

मैं तिरी आँख को तश्बीह दूँ मयख़ाने से
और ख़ुद ज़हर-ए-जुदाई का तलबगार रहूँ
ग़ैर सोए तिरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव में
और मैं चाँदनी रातों मैं फ़क़त शे'र कहूँ

मुझ से ये तेरे क़सीदे न लिखे जाएँगे
मुझ से तेरे लिए ये ग़ज़लें न कही जाएँगी
याद में तेरी मैं सुलगा न सकूँगा आँखें
सख़्तियाँ दर्द की मुझ से न सही जाएँगी
शहर में ऐसे मुसव्विर हैं जो सिक्कों के एवज़
हुस्न में लैला-ओ-अज़रा से बढ़ा देंगे तुझे
तूल दे कर तिरी ज़ुल्फ़ों को शब-ए-ग़म की तरह
फ़न के ए'जाज़ से नागिन सी बना देंगे तुझे

तुझ को शहर की ज़रूरत है मोहब्बत की मुझे
ऐ हसीना तिरी मंज़िल मिरी मंज़िल में नहीं
नाच घर तेरी निगाहों में हैं रक़्साँ लेकिन
इस तअ'य्युश की तमन्नाएँ मिरे दिल में नहीं

देख के ग़ैर के पहलू में तुझे रक़्स-कुनाँ
भीग जाती है मिरी आँख सरिश्क-ए-ग़म से
मुझ को बरसों की ग़ुलामी का ख़याल आता है
जिस ने अंदाज़-ए-वफ़ा छीन लिया है हम से

मुझ को भँवरा न समझ मुझ को पतंगा न समझ
मुझ को इंसान समझ मेरी सदाक़त से न खेल
तेरी तफ़रीह का सामाँ न बनूँगा हरगिज़
मेरी दुनिया है यही मेरी मोहब्बत से न खेल

— Habib Jalib

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