अश्क़-ओ-ख़ून घुलते हैं तब दीदा-ए-तर बनती है

दास्तान इश्क़ में मरने से अमर बनती है

चीख़ पड़ता है मुसव्विर सभी रंगों के साथ
कैनवस पर मेरी तस्वीर अ
गर बनती है

इतना आसान नहीं होता है दिन का आना
डूब जाते हैं सितारे तो सहर बनती है

सब को हासिल है ये बीनाई की दौलत लेकिन
देखने वाली तो मुश्किल से नज़र बनती है

टक-टकी बाँध के बैठें हैं वहीं रातों में
तेरी तस्वीर दीवारों पे जिधर बनती है

पूछते फिरते हैं शहर में अब तो 'जानी'
यार टूटी हुई तक़दीर किधर बनती है

— Jaani Lakhnavi

More by Jaani Lakhnavi

Other ghazal from the same pen

See all from Jaani Lakhnavi →

Valentine Shayari Collection

Shers of valentine shayari collection.

All Valentine Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling