Krishna Bihari Noor

Krishna Bihari Noor

@krishna-bihari-noor

Krishna Bihari Noor shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Krishna Bihari Noor's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

47

Content

12

Likes

290

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

मैं जिस के हाथ में इक फूल दे के आया था उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है — Krishna Bihari Noor
अब इस को अपनी हार कहूँ या कहूँ मैं जीत रूठा हुआ था मैं, वो मना ले गया मुझे — Krishna Bihari Noor
सच घटे या बढ़े तो सच न रहे झूट की कोई इंतिहा ही नहीं — Krishna Bihari Noor
मरने वालों को भी मिलते नहीं मरने वाले मौत ले जा के ख़ुदा जाने कहाँ छोड़ती है — Krishna Bihari Noor
मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए — Krishna Bihari Noor
चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो आइना झूट बोलता ही नहीं — Krishna Bihari Noor
ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं और क्या जुर्म है पता ही नहीं — Krishna Bihari Noor

Ghazal

लफ़्ज़ों के ये नगीने तो निकले कमाल के ग़ज़लों ने ख़ुद पहन लिए ज़ेवर ख़याल के ऐसा न हो गुनाह की दलदल में जा फँसूँ ऐ मेरी आरज़ू मुझे ले चल सँभाल के पिछले जन्म की गाढ़ी कमाई है ज़िंदगी सौदा जो करना करना बहुत देख-भाल के मौसम हैं दो ही इश्क़ के सूरत कोई भी हो हैं उस के पास आइने हिज्र-ओ-विसाल के अब क्या है अर्थ-हीन सी पुस्तक है ज़िंदगी जीवन से ले गया वो कई दिन निकाल के यूँँ ज़िंदगी से कटता रहा जुड़ता भी रहा बच्चा खिलाए जैसे कोई माँ उछाल के ये ताज ये अजंता एलोरा के शाहकार अफ़्साने से लिखे हैं उरूज-ओ-ज़वाल के — Krishna Bihari Noor
अपने होने का सुबूत और निशाँ छोड़ती है रास्ता कोई नदी यूँँ ही कहाँ छोड़ती है नशे में डूबे कोई, कोई जिए, कोई मरे तीर क्या क्या तेरी आँखों की कमाँ छोड़ती है बंद आँखों को नज़र आती है जाग उठती है रौशनी ऐसी हर आवाज़-ए-अज़ाँ छोड़ती है ख़ुद भी खो जाती है, मिट जाती है, मर जाती है जब कोई क़ौम कभी अपनी ज़बाँ छोड़ती है आत्मा नाम ही रखती है न मज़हब कोई वो तो मरती भी नहीं सिर्फ़ मकाँ छोड़ती है एक दिन सब को चुकाना है अनासिर का हिसाब ज़िन्दगी छोड़ भी दे मौत कहाँ छोड़ती है ज़ब्त-ए-ग़म खेल नहीं है अब कैसे समझाऊँ देखना मेरी चिता कितना धुआँ छोड़ती है — Krishna Bihari Noor
बस एक वक़्त का ख़ंजर मिरी तलाश में है जो रोज़ भेस बदल कर मिरी तलाश में है ये और बात कि पहचानता नहीं है मुझे सुना है एक सितमगर मिरी तलाश में है अधूरे ख़्वाबों से उकता के जिस को छोड़ दिया शिकन-नसीब वो बिस्तर मिरी तलाश में है ये मेरे घर की उदासी है और कुछ भी नहीं दिया जलाए जो दर पर मिरी तलाश में है अज़ीज़ हूँ मैं मुझे किस क़दर कि हर इक ग़म तिरी निगाह बचा कर मिरी तलाश में है मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है हुआ करे जो समुंदर मिरी तलाश में है वो एक साया है अपना हो या पराया हो जनम जनम से बराबर मिरी तलाश में है मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में वो मेरे जिस्म से बाहर मेरी तलाश में है मैं जिस के हाथ में इक फूल दे के आया था उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है वो जिस ख़ुलूस की शिद्दत ने मार डाला 'नूर' वही ख़ुलूस मुक़र्रर मिरी तलाश में है — Krishna Bihari Noor
रंग लाया न कभी बर्गे-हिना मेरे बा'द उस हथेली पे कोई गुल न खिला मेरे बा'द उस ने यूँ ही नहीं छोड़ी है जफ़ा मेरे बा'द तीर ही कोई न तरकश में बचा मेरे बा'द आइना दिल का मेरे होते हुए कर लो साफ़ यूँ भी उड़ा जाएगी ये गर्दे-अना मेरे बा'द मैं ने जब छोड़ दी दुनिया तो अकेला ही रहा कौन देता मेरे होने का पता मेरे बा'द कूचए-यार की बातें मैं किया करता था अब अगर आती तो क्या पाती सबा मेरे बा'द जिस्म होता तो नज़र आता भी मैं भी, वो भी साथ रहता है मेरे मेरा ख़ुदा मेरे बा'द परवरिश जिस की जहाँ होती है रहता है वहीं किस के घर जाएगा सैलाबे-बला मेरे बा'द नूर बस इतना ही महसूस हुआ ये जाना फ़र्क होने का न होने का मिटा मेरे बा'द — Krishna Bihari Noor