यहाँ ऊँचाइयों से किस को अब डर लग रहा है
खड़ा होऊँ अगर तो आसमाँ से सर लग रहा है
मुझे कुछ इस तरह इस सादगी ने है ठगा की
दुपट्टा सर पे रखने वालों से डर लग रहा है
अगर मैं चाह लूँ तो इस ज़हालत से निकल लूँ
मगर मख्लूक जीवन मुझ को बेह्तर लग रहा है
बहुत आगे निकल सकता हूँ मैं ख़ुद से कभी भी
मगर ये मौत मुझ को छोटा तस्कर लग रहा है
तुम्हारे साथ की तस्वीर से एल्बम बनी जो
तुम्हारे बा'द वो एल्बम पुरा ब्लर् लग रहा है
— Ajit Yadav














