नहीं जो आब से निकला तो चिंगारी से निकलूँगा
धड़कने वाले दिल की चार-दीवारी से निकलूँगा
हमारे ख़त जला दो या बहा दो दरिया में जाना
कभी जो पैरहन बदला तो अलमारी से निकलूँगा
कबूतर छत पे बैठा है मगर तू ख़त नहीं लेता
अगर ऐसा रहा तो तेरी बेगारी से निकलूँगा
तू मुझ को छोड़ भी दे तो गिला कुछ भी नहीं तूझ से
मैं ख़ुद भी तो मोहब्बत की अदाकारी से निकलूँगा
मोहब्बत में अगर हम हार भी जाएँ तो ख़ुश हैं की
बहुत जल्दी मैं इस झूठी वफ़ादारी से निकलूँगा
— Ajit Yadav














