Neeraj Nainkwal

Neeraj Nainkwal

@Neerajnainkwal

Neeraj Nainkwal shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Neeraj Nainkwal's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

आख़िरी बेंच पर यूँँ बुलाकर मुझे आई लव यूँ कहा मुस्कुरा कर मुझे — Neeraj Nainkwal
उस ने पूछा ही नहीं तब घर में आने के लिए मैं गया था पास जिस के दिल लगाने के लिए — Neeraj Nainkwal
सर्दियों में सड़क पर सुला देती है रात दिन रोज़ी रोटी रुला देती है — Neeraj Nainkwal
ख़ूब-सूरत दीवाने धनी लोग हैं इस ज़माने में सब मतलबी लोग हैं — Neeraj Nainkwal
नज़्मों में ग़ज़लों में अच्छा लगता है इश्क़ मियाँ फिल्मों में अच्छा लगता है — Neeraj Nainkwal
हर गली, हर गाँव ये तो शहर भर का मसअला है काम धंधा रोज़ी रोटी आम घर का मसअला है — Neeraj Nainkwal
तुम जो होते ख़ूब-सूरत होती और भी ज़िंदगी पर रदीफ़ों के बिना भी ग़ज़लें ग़ज़लें होती हैं — Neeraj Nainkwal
आसमाॅं में ख़्वाब कितने ही सजाती चल रही है मैं फ़क़त वो ख़ाक हूँ जो तू उड़ाती चल रही है — Neeraj Nainkwal
तीरगी जैसे निकलती है दिए की रौशनी से एक दिन मैं भी चला जाऊँगा तेरी ज़िंदगी से — Neeraj Nainkwal
इक मुहब्बत से भरी उस ज़िंदगी के ख़्वाब हैं पेड़ दरिया और पंछी तेरे मेरे ख़्वाब हैं — Neeraj Nainkwal

Ghazal

एक लड़की को जहाँ में बे सहारा देख कर लोग आते जाते हैं घर उस के मौक़ा' देख कर जो यहाँ झगड़ा हुआ वो तेरे ही घर में हुआ सब चलें जाते हैं अपने घर तमाशा देख कर चमचमाते चाँद को इग्नोर कर देता हूँ मैं मुस्कुराती लड़की को खिड़की में बैठा देख कर दोस्ती में प्यार की कोई कमी हरगिज़ नहीं दोस्त भी कम हो गए हैं थोड़ा पैसा देख कर रूठ जाए वो अगर मुझ सेे तो रोने लगता हूँ जो नहीं रोता कभी भी मुझ को रोता देख कर ये ज़माना है नए फ़ैशन चमकती जींस का अच्छा लगता है तिरे सर पर दुपट्टा देख कर है गुज़ारी बा'द तेरे मैं ने अपनी ज़िंदगी दिन को पंछी देख कर और शब में चंदा देख कर मंज़िलें तो संगमरमर जैसी मिलती हैं मगर लोग घबरा जाते हैं बस कच्चा रस्ता देख कर — Neeraj Nainkwal
मेरा किसी से कोई भी रिश्ता नहीं मतलब जो भी मेरा है वो मेरा नहीं ये ख़ुशियाँ आख़िर में तो ग़म ही देती हैं टेबल पे वो कांटा है गुलदस्ता नहीं कैसे हो पाए उन के घर बरकत भला जिन के भी घर में कोई इक बिटिया नहीं उस ने कहा तुम कौन लगते हो मिरे? और मैं था जो इस बात को समझा नहीं मुझ सेे जुदा होना भी मर्ज़ी है तिरी ये रोना मेरा है तिरा रोना नहीं घर से निकाला जैसे माँ और बाप को माँ कहती है तू तो मिरा बेटा नहीं मेरी कही गज़लें ये सब वो बातें हैं जिन बातों को तुम ने कभी सुनना नहीं लौकी की सब्जी कितनी अच्छी लगती है ये बीवी का डर है तिरा कहना नहीं वो मेरे हँसने को ख़ुशी कह देता है हाँ है वो सच्चा, फिर भी वो सच्चा नहीं इस ईद पर सब दोस्तों ने मिलना है और बक्से में इक भी नया कुर्ता नहीं जन्नत तलाशी उस ने मस्जिद में बहुत इक बार उस ने माँ को पर देखा नहीं वो लोग जिन के चार-सू है रौशनी और उन की चौखट पे कोई दीया नहीं इक दिन ये कहना तुम अजी सुनते हो क्या? ये सिर्फ़ तेरा हक़ है और सबका नहीं वो कल मिरा घर देखने आएगी और रहने को मेरे पास इक कमरा नहीं दौलत है और ये शोहरत फिर भी मैं एक निर्धन रहा जो पास मेरी माँ नहीं सब रोना रो देते हैं सबके सामने रोना ये है रोना कभी दिखता नहीं मेरी पतंगो ने हमेशा कटना है इक डोर काटे मेरा वो धागा नहीं तेरे जुदा होने पर अब ये हाल है कोई ख़ुशी हो चाहे मैं हँसता नहीं नीरज भले शरबत बनाओ कितने भी उस ने यही कहना है ये मीठा नहीं — Neeraj Nainkwal