ये दिल मिरा, मिरे ही कदमों में आ गिरा है
जाने ये बंदा क्या उस लड़की में पा गया है
आवाज़ दे रहा हूँ जिस को गली-गली में
वो शख़्स इस बदन के अंदर से झाँकता है
वो एक ही झरोखा था तुम जहाँ से आती
ऐ रौशनी वहाँ अब जाला पड़ा हुआ है
ये पिछले साल ही की तो बात है कि हम - तुम
ये साल भी यही सब कहते हुए कटा है
तू तो कभी किसी को सच में मिला नहीं पर
फिर भी यहाँ का हर शै तुझ में रमा हुआ है
जो आप के मुताबिक चेहरे पे है मुखौटा
दर-अस्ल वो किसी का फ्लेवर चढ़ा हुआ है
ये ज़िंदगी नहीं है! सर सोनपाल साहब
इक आग ने मुझे उठ-उठ कर यही कहा है
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