koi samundar koi nadi hoti koi dariya hota | कोई समुन्दर, कोई नदी होती, कोई दरिया होता

  - Tehzeeb Hafi

कोई समुन्दर, कोई नदी होती, कोई दरिया होता
हम जितने प्यासे थे हमारा एक गिलास से क्या होता?

  - Tehzeeb Hafi

Nadii Shayari

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    मुतअस्सिर हैं यहाँ सब लोग जाने क्या समझते हैं
    नहीं जो यार शबनम भी उसे दरिया समझते हैं

    हक़ीक़त सारी तेरी मैं बता तो दूँ सर-ए-महफ़िल
    मगर ये लोग सारे जो तुझे अच्छा समझते हैं
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    Nirvesh Navodayan
    मुहब्बत आपसे करना कभी आसाँ नहीं था पर
    बिना कश्ती के दरिया पार करना शौक़ है मेरा
    Tanoj Dadhich
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    मंज़र बना हुआ हूँ नज़ारे के साथ मैं
    कितनी नज़र मिलाऊँ सितारे के साथ मैं

    दरिया से एक घूँट उठाने के वास्ते
    भागा हूँ कितनी दूर किनारे के साथ मैं
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    Khalid Sajjad
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    मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया
    सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ कि मैं दरिया से जुदा हूँ
    Nazeer Banarasi
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    आँख आँसू को ऐसे रस्ता देती है
    जैसे रेत गुज़रने दरिया देती है

    कोई भी उसको जीत नहीं पाया अब तक
    वैसे वो हर एक को मौक़ा देती है
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    Kafeel Rana
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    दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं
    तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख
    Adil Mansuri
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    दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी
    और पानी की तह में वो मुझे ढूँड रहा था
    Adil Mansuri
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    ये नदी वर्ना तो कब की पार थी
    मेरे रस्ते में अना दीवार थी

    आप को क्या इल्म है इस बात का
    ज़िंदगी मुश्किल नहीं दुश्वार थी

    थीं कमानें दुश्मनों के हाथ में
    और मेरे हाथ में तलवार थी

    जल गए इक रोज़ सूरज से चराग़
    रौशनी को रौशनी दरकार थी

    आज दुनिया के लबों पर मुहर है
    कल तलक हाँ साहब-ए-गुफ़्तार थी
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    ARahman Ansari
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    तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पे वार करो
    मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो
    Rahat Indori
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    सदा लपेट के दिल जाएँगे वगरना नहीं
    पहाड़ आह से हिल जाएँगे वगरना नहीं

    वो आज दरिया से लड़ने की ठान कर गए थे
    कहीं किनारे पे मिल जाएँगे वगरना नहीं
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    Nadeem Bhabha
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As you were reading Shayari by Tehzeeb Hafi

    जब उस की तस्वीर बनाया करता था
    कमरा रंगों से भर जाया करता था

    पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे
    मैं जंगल में पानी लाया करता था

    थक जाता था बादल साया करते करते
    और फिर मैं बादल पे साया करता था

    बैठा रहता था साहिल पे सारा दिन
    दरिया मुझ से जान छुड़ाया करता था

    बिंत-ए-सहरा रूठा करती थी मुझ से
    मैं सहरा से रेत चुराया करता था
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    Tehzeeb Hafi
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    अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास
    मैं तुम्हें कहता भी रहता था कि दुनिया तेज़ है
    Tehzeeb Hafi
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    रुक गया है वो या चल रहा है हमको सब कुछ पता चल रहा है
    उसने शादी भी की है किसी से और गाँव में क्या चल रहा है
    Tehzeeb Hafi
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    अब उस जानिब से इस कसरत से तोहफे आ रहे हैं
    के घर में हम नई अलमारियाँ बनवा रहे हैं।

    हमे मिलना तो इन आबादियों से दूर मिलना
    उससे कहना गए वक्तू में हम दरिया रहे हैं।

    तुझे किस किस जगह पर अपने अंदर से निकालें
    हम इस तस्वीर में भी तूझसे मिल के आ रहे हैं।

    हजारों लोग उसको चाहते होंगे हमें क्या
    के हम उस गीत में से अपना हिस्सा गा रहे हैं।

    बुरे मौसम की कोई हद नहीं तहजीब हाफी
    फिजा आई है और पिंजरों में पर मुरझा रहे हैं।
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    Tehzeeb Hafi
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    भरम रखा है तेरे हिज्र का वरना क्या होता है
    मैं रोने पे आ जाऊँ तो झरना क्या होता है

    मेरा छोड़ो मैं नइँ थकता मेरा काम यही है
    लेकिन तुमने इतने प्यार का करना क्या होता है
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    Tehzeeb Hafi
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