Ameeq Hanafi

Ameeq Hanafi

@ameeq-hanafi

Ameeq Hanafi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ameeq Hanafi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दोनों का मिलना मुश्किल है दोनों हैं मजबूर बहुत उस के पाँव में मेहंदी लगी है मेरे पाँव में छाले हैं — Ameeq Hanafi
फूल खिले हैं लिखा हुआ है तोड़ो मत और मचल कर जी कहता है छोड़ो मत — Ameeq Hanafi
सिगरेट जिसे सुलगता हुआ कोई छोड़ दे उस का धुआँ हूँ और परेशाँ धुआँ हूँ मैं — Ameeq Hanafi

Ghazal

अमीक़' छेड़ ग़ज़ल ग़म की इंतिहा कब है ये मालवे की जुनूँ-ख़ेज़ चौदहवीं शब है मुझे शिकायत-ए-तल्ख़ी-ए-ज़हर-ए-ग़म कब है मिरे लबों पे अभी कैफ़-ए-शक्कर-ए-लब है लकीर खिंचती चली जा रही है ता-बा-जिगर फ़रोग़-ए-मय है कि मश्क़-ए-जराहत-ए-शब है ये महवियत है कि रो'ब-ए-जमाल है तारी ख़िलाफ़-ए-रस्म-ए-जुनूँ दिल बहुत मुअद्दब है कभी हरम में है काफ़िर तो दैर में मोमिन न जाने क्या दिल-ए-दीवाना तेरा मज़हब है बहुत मुहाल था वर्ना कि दिल फ़रेब में आए किसी के ग़म से ग़म-ए-काएनात की छब है चमन में फूल खिलाती फिरे बहार तो क्या किसी के बंद-ए-क़बा टूटने लगें तब है — Ameeq Hanafi
है नूर-ए-ख़ुदा भी यहाँ इरफ़ान-ए-ख़ुदा भी ये ज़ात कि है वादी-ए-सीना भी हिरा भी उस बन में किया करती है तप मेरी अना भी इस शहर में है कार-गह-ए-अर्ज़-ओ-समा भी करता हूँ तवाफ़ अपना तो मिलती है नई राह क़िबला भी है ये ज़ात मिरा क़िबला-नुमा भी ख़ुद-आगही ओ ख़ुद-निगही का है ये इनआ'म और जुर्म-ए-शनासाई-ए-आलम की सज़ा भी होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा सर-ए-एहसास जो देखती रहती है मिरी आँख दिखा भी करती है कमर-बस्ता सफ़र पर भी यही ज़ात जब दूर निकल जाता हूँ देती है सदा भी ज़र्रे में है कौनैन तो कौनैन में ज़र्रा कुछ है तुझे आवारा-ए-अफ़्लाक पता भी — Ameeq Hanafi
ग़ुबार-ओ-गर्द ने समझा है रहनुमा मुझ को तलाश करता फिरा है ये क़ाफ़िला मुझ को तवील राह-ए-सफ़र पर हैं फूट फूट पड़ा न क्यूँँ समझते मिरे पैर आबला मुझ को शिकस्त-ए-दिल की सदा हूँ बिखर भी जाने दे ख़ुतूत-ओ-रंग की ज़ंजीर मत पिन्हा मुझ को ज़मीन पर है समुंदर फ़लक पे अब्र-ए-ग़ुबार उतारती है कहाँ देखिए हवा मुझ को सुकूत तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का इक गराँ लम्हा बना गया है सदाओं का सिलसिला मुझ को वो दूर दूर से अब क्यूँँ मुझे जलाता है क़रीब आ के बहुत जो बुझा गया मुझ को रचा के एक तिलिस्म-ए-सवाबित-ओ-सय्यार कशिश में अपनी बुलाने लगा ख़ला मुझ को — Ameeq Hanafi
बीन हवा के हाथों में है लहरे जादू वाले हैं चंदन से चिकने शानों पर मचल उठे दो काले हैं जंगल की या बाज़ारों की धूल उड़ी है स्वागत को हम ने घर के बाहर जब भी अपने पाँव निकाले हैं कैसा ज़माना आया है ये उल्टी रीत है उल्टी बात फूलों को काँटे डसते हैं जो इन के रखवाले हैं घर के दुखड़े शहर के ग़म और देस बिदेस की चिंताएँ इन में कुछ आवारा कुत्ते हैं कुछ हम ने पाले हैं एक उसी को देख न पाए वर्ना शहर की सड़कों पर अच्छी अच्छी पोशाकें हैं अच्छी सूरत वाले हैं रात में दिल को क्या सूझी है उस के गाँव को चलने की जंगल में चीते रहते हैं राह में नद्दी नाले हैं दोनों का मिलना मुश्किल है दोनों हैं मजबूर बहुत उस के पाँव में मेहंदी लगी है मेरे पाँव में छाले हैं — Ameeq Hanafi