ग़ुबार-ओ-गर्द ने समझा है रहनुमा मुझ को
तलाश करता फिरा है ये क़ाफ़िला मुझ को
तवील राह-ए-सफ़र पर हैं फूट फूट पड़ा
न क्यूँँ समझते मिरे पैर आबला मुझ को
शिकस्त-ए-दिल की सदा हूँ बिखर भी जाने दे
ख़ुतूत-ओ-रंग की ज़ंजीर मत पिन्हा मुझ को
ज़मीन पर है समुंदर फ़लक पे अब्र-ए-ग़ुबार
उतारती है कहाँ देखिए हवा मुझ को
सुकूत तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का इक गराँ लम्हा
बना गया है सदाओं का सिलसिला मुझ को
वो दूर दूर से अब क्यूँँ मुझे जलाता है
क़रीब आ के बहुत जो बुझा गया मुझ को
रचा के एक तिलिस्म-ए-सवाबित-ओ-सय्यार
कशिश में अपनी बुलाने लगा ख़ला मुझ को
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Ameeq Hanafi
our suggestion based on Ameeq Hanafi
As you were reading Justaju Shayari Shayari