Kunwar Bechain

Kunwar Bechain

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Kunwar Bechain shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Kunwar Bechain's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal

Sher

उस ने मेरे छोटेपन की इस तरह इज़्ज़त रखी मैं ने दीवारें उठाईं उस ने उन पर छत रखी — Kunwar Bechain
चेहरे को आज तक भी तेरा इंतिज़ार है हम ने गुलाल और को मलने नहीं दिया — Kunwar Bechain
प्यार में कैसी थकन कह के ये घर से निकली कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक — Kunwar Bechain
उस ने फेंका मुझ पे पत्थर और मैं पानी की तरह और ऊँचा और ऊँचा और ऊँचा हो गया — Kunwar Bechain
दीवारों पर दस्तक देते रहिएगा दीवारों में दरवाज़े बन जाएँगे — Kunwar Bechain
तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी किसी के पाँव का काँटा निकाल कर देखो — Kunwar Bechain
एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है — Kunwar Bechain

Ghazal

कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है मुरझा रही है साँस की माला तो क्या हुआ बदले में तुझ को दे तो गए भूक और प्यास मुँह से जो तेरे छीना निवाला तो क्या हुआ आँखों से पी रहा हूँ तिरे प्यार की शराब गर छुट गया है हाथ से प्याला तो क्या हुआ धरती को मेरी ज़ात से कुछ तो नमी मिली फूटा है मेरे पाँव का छाला तो क्या हुआ सारे जहाँ ने मुझ पे लगाई हैं तोहमतें तुम ने भी मेरा नाम उछाला तो क्या हुआ सर पर है माँ के प्यार का आँचल पड़ा हुआ मुझ पर नहीं है कोई दुशाला तो क्या हुआ मंचों पे चुटकुले हैं लतीफ़े हैं आज-कल मंचों पे ने हैं पंत निराला तो क्या हुआ ऐ ज़िंदगी तू पास में बैठी हुई तो है शीशे में तुझ को गर नहीं ढाला तो क्या हुआ आँखों के घर में आई नहीं रौशनी 'कुँवर' टूटा है फिर से नींद का ताला तो क्या हुआ — Kunwar Bechain
इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ उस को क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है आज शब्दों की सभा में एक ये ही शोर था सुर्ख़ है क्यूँ सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा आज भी जिस ज़ख़्म को हम ने सिया बीमार है रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को अब इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है कल ग़ज़ल में प्यार के ही काफ़िये का ज़ोर था आज लेकिन प्यार का ही काफ़िया बीमार है — Kunwar Bechain