chehre ko aaj tak bhi tera intizaar hai | चेहरे को आज तक भी तेरा इंतिज़ार है

  - Kunwar Bechain

चेहरे को आज तक भी तेरा इंतिज़ार है
हम ने गुलाल और को मलने नहीं दिया

  - Kunwar Bechain

Charagh Shayari

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    कोई नहीं है देखने वाला तो क्या हुआ
    तेरी तरफ़ नहीं है उजाला तो क्या हुआ

    चारों तरफ़ हवाओं में उस की महक तो है
    मुरझा रही है साँस की माला तो क्या हुआ

    बदले में तुझ को दे तो गए भूक और प्यास
    मुँह से जो तेरे छीना निवाला तो क्या हुआ

    आँखों से पी रहा हूँ तिरे प्यार की शराब
    गर छुट गया है हाथ से प्याला तो क्या हुआ

    धरती को मेरी ज़ात से कुछ तो नमी मिली
    फूटा है मेरे पाँव का छाला तो क्या हुआ

    सारे जहाँ ने मुझ पे लगाई हैं तोहमतें
    तुम ने भी मेरा नाम उछाला तो क्या हुआ

    सर पर है माँ के प्यार का आँचल पड़ा हुआ
    मुझ पर नहीं है कोई दुशाला तो क्या हुआ

    मंचों पे चुटकुले हैं लतीफ़े हैं आज-कल
    मंचों पे ने हैं पंत निराला तो क्या हुआ

    ऐ ज़िंदगी तू पास में बैठी हुई तो है
    शीशे में तुझ को गर नहीं ढाला तो क्या हुआ

    आँखों के घर में आई नहीं रौशनी 'कुँवर'
    टूटा है फिर से नींद का ताला तो क्या हुआ
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    Kunwar Bechain
    दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना
    जैसे बहते हुए पानी पे हो पानी लिखना

    कोई उलझन ही रही होगी जो वो भूल गया
    मेरे हिस्से में कोई शाम सुहानी लिखना

    आते जाते हुए मौसम से अलग रह के ज़रा
    अब के ख़त में तो कोई बात पुरानी लिखना

    कुछ भी लिखने का हुनर तुझ को अगर मिल जाए
    इश्क़ को अश्कों के दरिया की रवानी लिखना

    इस इशारे को वो समझा तो मगर मुद्दत बा'द
    अपने हर ख़त में उसे रात-की-रानी लिखना
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    Kunwar Bechain
    तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी
    किसी के पाँव का काँटा निकाल कर देखो
    Kunwar Bechain
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    इस नए माहौल में जो भी जिया बीमार है
    जिस किसी से भी नया परिचय किया बीमार है

    हंस रही है कांच के कपडे पहनकर बिजलियाँ
    उसको क्या मालूम मिट्टी का दिया बीमार है

    आज शब्दों की सभा में एक ये ही शोर था
    सुर्ख है क्यों सुर्खियाँ जब हाशियाँ बीमार है

    काम में आए नहीं धागे, सुई, मरहम, दवा
    आज भी जिस ज़ख्म को हमने सिया बीमार है

    रोग कुछ ऐसे मिले है शहर की झीलों को अब
    इनका पानी जिस किसी ने भी पिया बीमार है

    एक भी उम्मीद की चिट्ठी इधर आती नहीं
    हो न हो अपने समय का डाकिया बीमार है

    कल ग़ज़ल में प्यार के ही काफ़िये का ज़ोर था
    आज लेकिन प्यार का ही काफ़िया बीमार है
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    Kunwar Bechain
    प्यार में कैसी थकन कह के ये घर से निकली
    कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक
    Kunwar Bechain
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