जितना भी हम जिए उतने ही परेशान रहे
हो गए ख़ाक तो भी दर्दस सोज़ान रहे
ज़िन्दगी जी न सकूँगा कभी भी चैन से मैं
मेरे सीने में अगर ज़िंदा ये अरमान रहे
हम तलबगार-ए-रिहाई-ए-मुहब्बत थे मगर
'उम्र भर के लिए हम क़ैदी-ए-ज़िंदान रहे
बुत-परस्ती का सिला तो हमें मिलना ही था
साँस चलती थी मगर जिस्म से बे-जान रहे
बादा-ए-नाब है ये ज़िन्दगी या ख़ून-ए-जिगर
कोई बतला दे तो ता-उम्र ये एहसान रहे
एक भी गुल न खिला मेरे इन अश्कों से कभी
जाने कितने मेरी आँखों में बयाबान रहे
मिस्ल-ए-तहरीर है ये हुस्न या मिस्ल-ए-नग़्मा
जितना भी देखा तुझे उतने ही हैरान रहे
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Mukesh Jha
our suggestion based on Mukesh Jha
As you were reading Peace Shayari Shayari