मिलते हुए कहीं न कहीं फ़ासला भी था
शायद हमारे बीच कोई तीसरा भी था
दुनिया अगर इधर से उधर हो गई कभी
मत भूलना कि ज़ख़्मों की कोई दवा भी था
मैं ने भी कह दिया कि मुझे याद तक नहीं
तुम से कभी मिला भी था, कुछ राब्ता भी था
देखा नहीं किसी ने मुहब्बत को ग़ौर से
जो आज बे-वफ़ा है कभी बा-वफ़ा भी था
ख़्वाहिश नहीं है मुझ को कि तुम बात ही करो
बस दोस्तों में याद रखो एक 'झा' भी था
— Mukesh Jha















