जी सकूँगा नहीं मैं तेरी मुहब्बत के बग़ैर
जैसे गुल खिल ही नहीं सकते सबाहत के बग़ैर
वो ज़माना गया जब 'इश्क़ ख़ुदा होता था
अब कोई करता नहीं 'इश्क़ तिजारत के बग़ैर
कैसे हासिल हो किसी को भी जहाँ में ताबीर
ये तो मुमकिन ही नहीं तेरी इनायत के बग़ैर
ये ज़मीं 'इश्क़ की मुमकिन है कि दलदल निकले
पाँव मत रखना कभी मेरी हिदायत के बग़ैर
मुझसे जितनी भी शिकायत है तुम्हें, कह डालो
'इश्क़ पे चढ़ता नहीं रंग शिकायत के बग़ैर
अहमियत कैसे समझता वो मुहब्बत में मेरी
उसको हासिल हो गया था मैं ज़रूरत के बग़ैर
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