Saleem Kausar

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Saleem Kausar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Saleem Kausar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अगर मैं सूरज के साथ ढलने से बच गया तो कहाँ गुज़ारूँगा शाम सोचा हुआ है मैं ने — Saleem Kausar
मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है — Saleem Kausar
कभी इश्क़ करो और फिर देखो इस आग में जलते रहने से कभी दिल पर आँच नहीं आती कभी रंग ख़राब नहीं होता — Saleem Kausar
तुम्हारी तरह जीने का हुनर आता तो फिर शायद मकान अपना वही रखते पता तब्दील कर लेते — Saleem Kausar
तुम्हारे साथ चलने पर जो दिल राज़ी नहीं होता बहुत पहले हम अपना फ़ैसला तब्दील कर लेते — Saleem Kausar

Ghazal

कहाँ से आएँगे दाम सोचा हुआ है मैं ने छुड़ाना है इक ग़ुलाम सोचा हुआ है मैं ने अगर मैं सूरज के साथ ढलने से बच गया तो कहाँ गुज़ारूँगा शाम सोचा हुआ है मैं ने में इक मुसलसल सफ़र में गुम हूँ मगर वो बस्ती जहाँ करूँँगा क़याम सोचा हुआ है मैं ने मैं एक ऐसा जहाँ बनाने की फ़िक्र में हूँ कि जिस का हर इंतिज़ाम सोचा हुआ है मैं ने मेरी दुआ है वो आए और मैं उसे पुकारूँ कि उस का अच्छा सा नाम सोचा हुआ है मैं ने शुरू करने का वक़्त ही तो नहीं है वर्ना कहानी का इख़्तिताम सोचा हुआ है मैं ने मेरा अदू मेरा दोस्त बन जाएगा बिल-आख़िर 'सलीम' वो इंतिक़ाम सोचा हुआ है मैं ने — Saleem Kausar
दिल तुझे नाज़ है जिस शख़्स की दिलदारी पर देख अब वो भी उतर आया अदाकारी पर मैं ने दुश्मन को जगाया तो बहुत था लेकिन एहतिजाजन नहीं जागा मेरी बेदारी पर आदमी आदमी को खाए चला जाता है कुछ तो तहक़ीक़ करो इस नई बीमारी पर कभी इस जुर्म पे सर काट दिए जाते थे अब तो इनआ'म दिया जाता है ग़द्दारी पर तेरी क़ुर्बत का नशा टूट रहा है मुझ में इस क़दर सहल न हो तू मेरी दुश्वारी पर मुझ में यूँँ ताज़ा मुलाक़ात के मौसम जागे आइना हँसने लगा है मेरी तय्यारी पर कोई देखे भरे बाज़ार की वीरानी को कुछ न कुछ मुफ़्त है हर शय की ख़रीदारी पर बस यही वक़्त है सच मुँह से निकल जाने दो लोग उतर आए हैं ज़ालिम की तरफ़-दारी पर — Saleem Kausar
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है अजब ए'तिबार ओ बे-ए'तिबारी के दरमियान है ज़िंदगी मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं तिरी दास्ताँ कोई और थी मिरा वाक़िआ' कोई और है वही मुंसिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की इबारतें मिरा जुर्म तो कोई और था प मिरी सज़ा कोई और है कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है जो मिरी रियाज़त-ए-नीम-शब को 'सलीम' सुब्ह न मिल सकी तो फिर इस के मअ'नी तो ये हुए कि यहाँ ख़ुदा कोई और है — Saleem Kausar
क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं कौन सी आँखों में मेरे ख़्वाब रौशन हैं अभी किस की नींदें हैं जो मेरे रतजगों में क़ैद हैं शहर आबादी से ख़ाली हो गए ख़ुश्बू से फूल और कितनी ख़्वाहिशें हैं जो दिलों में क़ैद हैं पाँव में रिश्तों की ज़ंजीरें हैं दिल में ख़ौफ़ की ऐसा लगता है कि हम अपने घरों में क़ैद हैं ये ज़मीं यूँँही सिकुड़ती जाएगी और एक दिन फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ साहिलों में क़ैद हैं इस जज़ीरे पर अज़ल से ख़ाक उड़ती है हवा मंज़िलों के भेद फिर भी रास्तों में क़ैद हैं कौन ये पाताल से उभरा किनारे पर 'सलीम' सर-फिरी मौजें अभी तक दाएरों में क़ैद हैं — Saleem Kausar
कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए दिए की लौ से छलकता है उस के हुस्न का अक्स सिंगार करते हुए आईना सजाते हुए अब इस जगह से कई रास्ते निकलते हैं मैं गुम हुआ था जहाँ रास्ता बताते हुए पुकारते हैं उन्हें साहिलों के सन्नाटे जो लोग डूब गए कश्तियाँ बनाते हुए फिर उस ने मुझ से किसी बात को छुपाया नहीं वो खुल गया था किसी बात को छुपाते हुए मुझी में था वो सितारा-सिफ़त कि जिस के लिए मैं थक गया हूँ ज़माने की ख़ाक उड़ाते हुए मज़ारों और मुंडेरों के रत-जगों में 'सलीम' बदन पिघलने लगे हैं दिए जलाते हुए — Saleem Kausar