qurbaten hote hue bhi faaslon men qaid hain | क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं

  - Saleem Kausar

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं
कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं

कौन सी आँखों में मेरे ख़्वाब रौशन हैं अभी
किस की नींदें हैं जो मेरे रतजगों में क़ैद हैं

शहर आबादी से ख़ाली हो गए ख़ुश्बू से फूल
और कितनी ख़्वाहिशें हैं जो दिलों में क़ैद हैं

पाँव में रिश्तों की ज़ंजीरें हैं दिल में ख़ौफ़ की
ऐसा लगता है कि हम अपने घरों में क़ैद हैं

ये ज़मीं यूँँही सिकुड़ती जाएगी और एक दिन
फैल जाएँगे जो तूफ़ाँ साहिलों में क़ैद हैं

इस जज़ीरे पर अज़ल से ख़ाक उड़ती है हवा
मंज़िलों के भेद फिर भी रास्तों में क़ैद हैं

कौन ये पाताल से उभरा किनारे पर 'सलीम'
सर-फिरी मौजें अभी तक दाएरों में क़ैद हैं

  - Saleem Kausar

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