Akhtar Shumar

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@akhtar-shumar

Akhtar Shumar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Shumar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने तू समझता है मुझे तुझ सेे गिला कुछ भी नहीं — Akhtar Shumar
मुद्दतों में आज दिल ने फ़ैसला आख़िर दिया ख़ूब-सूरत ही सही लेकिन ये दुनिया झूट है — Akhtar Shumar

Ghazal

वो जिस का अक्स लहू को जगा दिया करता मैं ख़्वाब ख़्वाब में उस को सदा दिया करता क़रीब आती जो तारीख़ उस के मिलने की वो अपने वादे की मुद्दत बढ़ा दिया करता मैं ज़िंदगी के सफ़र में था मश्ग़ला उस का वो ढूँड ढूँड के मुझ को गँवा दिया करता उसे समेटता मैं जब भी एक नुक़्ते में वो मेरे ध्यान में तितली उड़ा दिया करता उसी के गाँव की राहों में बैठ कर हर रोज़ मैं दिल का हाल हवा को सुना दिया करता मुझे वो आँख में रख कर 'शुमार' पिछली शब अजब ख़ुमार में पलकें गिरा दिया करता न छेड़ मुझ को ज़माना वो और था जिस में फ़क़ीर गाली के बदले दुआ दिया करता — Akhtar Shumar
ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था और इस के बा'द फ़क़त आँधियों को आना था मैं घर को फूँक रहा था बड़े यक़ीन के साथ कि तेरी राह में पहला क़दम उठाना था वगरना कौन उठाता ये जिस्म ओ जाँ के अज़ाब ये ज़िंदगी तो मोहब्बत का इक बहाना था ये कौन शख़्स मुझे किर्चियों में बाँट गया ये आइना तो मिरा आख़िरी ठिकाना था पहाड़ भाँप रहा था मिरे इरादे को वो इस लिए भी कि तेशा मुझे उठाना था बहुत सँभाल के लाया हूँ इक सितारे तक ज़मीन पर जो मिरे इश्क़ का ज़माना था मिला तो ऐसे कि सदियों की आशनाई हो! तआ'रुफ़ उस से भी हालाँकि ग़ाएबाना था मैं अपनी ख़ाक में रखता हूँ जिस को सदियों से ये रौशनी भी कभी मेरा आस्ताना था मैं हाथ हाथों में उस के न दे सका था 'शुमार' वो जिस की मुट्ठी में लम्हा बड़ा सुहाना था — Akhtar Shumar
लरज़ उठा है मिरे दिल में क्यूँँ न जाने दिया तिरा पयाम तो ख़ामोश सी हवा ने दिया जला रहा था मुझे मैं ने भी जलाने दिया उजाला उस ने दिया भी तो किस बहाने दिया अभी कुछ और ठहर जाता मेरे कहने पर वो जाने वाला था ख़ुद ही सो मैं ने जाने दिया वो अपनी सैर के क़िस्से मुझे सुनाता रहा मुझे तो हाल-ए-दिल उस ने कहाँ सुनाने दिया मैं शुक्र उस का न कैसे अदा करूँँ जानाँ शुऊ'र मुझ को मोहब्बत का जिस ख़ुदा ने दिया करम के पल में ये रौशन हुआ ब-हम्दिल्लाह नहीं बुझेगा मिरा तुझ से ऐ ज़माने दिया 'शुमार' सामने उस के भी गुफ़्तुगू के वक़्त जो रंग चेहरे पे आया था मैं ने आने दिया — Akhtar Shumar
हिसार-ए-क़र्या-ए-खूँबार से निकलते हुए ये दिल मलूल था आज़ार से निकलते हुए बड़ी ही देर तलक धूप मुझ को छू न सकी तुम्हारे साया-ए-दीवार से निकलते हुए कि फिर से तख़्त को आना था मेरे क़दमों में मैं पुर-यक़ीन था दरबार से निकलते हुए शुआ-ए-नूर के फूटे से जाँ लरज़ती थी तुम्हारी गर्मी-ए-रुख़्सार से निकलते हुए तुम्हारे ध्यान में गुम हो गई थी महकी हवा हुदूद-ए-जादा-ए-गुलज़ार से निकलते हुए मैं लौट आया तुझे छोड़ कर मगर आधा वहीं रहा दर-ओ-दीवार से निकलते हुए फ़ज़ा में देर तलक ख़ूब जगमगाते 'शुमार' वो लफ़्ज़ शोख़ी-ए-गुफ़्तार से निकलते हुए — Akhtar Shumar
ख़्वाहिश-ए-जादा-ए-राहत से निकलता कैसे दिल मिरा कू-ए-मलामत से निकलता कैसे साया-ए-वहम-ओ-गुमाँ चार तरफ़ फैला है मैं अभी कर्ब-ओ-अज़िय्यत से निकलता कैसे मेरी रुस्वाई अगर साथ न देती मेरा यूँँ सर-ए-बज़्म मैं इज़्ज़त से निकलता कैसे मेरी नज़रें जो न पड़तीं तो वहाँ पिछली शब इक सितारा सा तिरी छत से निकलता कैसे मैं कि बर्बाद हुआ दीद की ख़ातिर जिस की वो मिरे दीदा-ए-हैरत से निकलता कैसे उस के दम ही से तो क़ाएम है मिरा जाह-ओ-जलाल वो मिरे दिल की हुकूमत से निकलता कैसे जाग बैठा हूँ तो दिल डूबा नहीं है 'अख़्तर' सोया रहता तो मुसीबत से निकलता कैसे — Akhtar Shumar
सारी ख़िल्क़त एक तरफ़ थी और दिवाना एक तरफ़ तेरे लिए मैं पाँव पे अपने जम के खड़ा था एक तरफ़ एक इक कर के हर मंज़िल की सम्त ही भूल रहा था मैं धीरे धीरे खींच रहा था तेरा रिश्ता एक तरफ़ दोनों से मैं बच कर तेरे ख़्वाब-ओ-ख़याल से गुज़र गया दिल का सहरा एक तरफ़ था आँख का दरिया एक तरफ़ आगे आगे भाग रहा हूँ अब वो मेरे पीछे है इक दिन तेरी चाह में की थी मैं ने दुनिया एक तरफ़ दूसरी जानिब इक बादल ने बढ़ कर ढाँप लिया था चाँद और आँखों में डूब रहा था दिल का सितारा एक तरफ़ वक़्त-जुआरी की बैठक में जो आया सो हार गया 'अख़्तर' इक दिन मैं भी दामन झाड़ के निकला एक तरफ़ — Akhtar Shumar
तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है मगर ये दुख कि मिरी उम्र-ए-राएगाँ कम है मिरी निगाह की वुसअत भी इस में शामिल कर मिरी ज़मीन पे तेरा ये आसमाँ कम है तुझे ख़बर भी कहाँ है मिरे इरादों की तू मेरी सोचती आँखों का राज़-दाँ कम है इसी से हो गए मानूस ताइरान-ए-चमन वो जो कि बाग़ का दुश्मन है बाग़बाँ कम है अगरचे शहर में फैली कहानियाँ हैं बहुत कोई भी सुनने-सुनाने को दास्ताँ कम है निगाह ओ दिल पे खुली हैं हक़ीक़तें कैसी ये दिल उदास ज़ियादा है शादमाँ कम है अब इस से बढ़ के भी कोई है पुल-सिरात अभी मैं जी रहा हूँ यहाँ जैसे इम्तिहाँ कम है — Akhtar Shumar