apni baahon ko ham ne patwaar kiya tha | अपनी बाहों को हम ने पतवार किया था

  - Akhtar Shumar

अपनी बाहों को हम ने पतवार किया था
तब जा कर वो ख़ून का दरिया पार किया था

पत्थर फेंक के लोगों ने जब इज़्ज़त बख़्शी
हम ने अपने हाथों को दस्तार किया था

कौन से ख़्वाब ने रात अपनी आँखें खोली थीं
किस की ख़ुशबू ने दिल को बेदार किया था

उस ने दिल पर क़ब्ज़ा किया बन बैठा आमिर
हम ने जिस की शाही से इंकार किया था

बनते गए थे अपनी ठोकर से वो रस्ते
जिन रस्तों को तू ने कल दीवार किया था

जिन को कभी इक आँख न हम भाए थे 'अख़्तर'
हम ने उन की नफ़रत से भी प्यार किया था

  - Akhtar Shumar

Nigaah Shayari

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