Akhtar Shumar

Top 10 of Akhtar Shumar

    मुहब्बत भी मुसीबत है करें क्या
    मगर अपनी ज़रूरत है करें क्या

    हम उस से बच के चलना चाहते हैं
    मगर वो ख़ूब-सूरत है करें क्या
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    मुद्दतों में आज दिल ने फ़ैसला आख़िर दिया
    ख़ूब-सूरत ही सही लेकिन ये दुनिया झूट है
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    मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने
    तू समझता है मुझे तुझसे गिला कुछ भी नहीं
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    दुश्मनी कर मगर उसूल के साथ
    मुझ पर इतनी सी मेहरबानी हो

    मेरे मे'यार का तक़ाज़ा है
    मेरा दुश्मन भी ख़ानदानी हो
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    हिसार-ए-क़र्या-ए-खूँबार से निकलते हुए
    ये दिल मलूल था आज़ार से निकलते हुए

    बड़ी ही देर तलक धूप मुझ को छू न सकी
    तुम्हारे साया-ए-दीवार से निकलते हुए

    कि फिर से तख़्त को आना था मेरे क़दमों में
    मैं पुर-यक़ीन था दरबार से निकलते हुए

    शुआ-ए-नूर के फूटे से जाँ लरज़ती थी
    तुम्हारी गर्मी-ए-रुख़्सार से निकलते हुए

    तुम्हारे ध्यान में गुम हो गई थी महकी हवा
    हुदूद-ए-जादा-ए-गुलज़ार से निकलते हुए

    मैं लौट आया तुझे छोड़ कर मगर आधा
    वहीं रहा दर-ओ-दीवार से निकलते हुए

    फ़ज़ा में देर तलक ख़ूब जगमगाते 'शुमार'
    वो लफ़्ज़ शोख़ी-ए-गुफ़्तार से निकलते हुए
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    पड़े थे हम भी जहाँ रौशनी में बिखरे हुए
    कई सितारे मिले उस गली में बिखरे हुए

    मिरी कहानी से पहले ही जान ले प्यारे
    कि हादसे हैं मिरी ज़िंदगी में बिखरे हुए

    धनक सी आँख कहे बाँसुरी की लै में मुझे
    सितारे ढूँड के ला नग़्मगी में बिखरे हुए

    मैं पुर-सुकून रहूँ झील की तरह यानी
    किसी ख़याल किसी ख़ामुशी में बिखरे हुए

    वो मुस्कुरा के कोई बात कर रहा था 'शुमार'
    और उस के लफ़्ज़ भी थे चाँदनी में बिखरे हुए
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    सारी ख़िल्क़त एक तरफ़ थी और दिवाना एक तरफ़
    तेरे लिए मैं पाँव पे अपने जम के खड़ा था एक तरफ़

    एक इक कर के हर मंज़िल की सम्त ही भूल रहा था मैं
    धीरे धीरे खींच रहा था तेरा रिश्ता एक तरफ़

    दोनों से मैं बच कर तेरे ख़्वाब-ओ-ख़याल से गुज़र गया
    दिल का सहरा एक तरफ़ था आँख का दरिया एक तरफ़

    आगे आगे भाग रहा हूँ अब वो मेरे पीछे है
    इक दिन तेरी चाह में की थी मैं ने दुनिया एक तरफ़

    दूसरी जानिब इक बादल ने बढ़ कर ढाँप लिया था चाँद
    और आँखों में डूब रहा था दिल का सितारा एक तरफ़

    वक़्त-जुआरी की बैठक में जो आया सो हार गया
    'अख़्तर' इक दिन मैं भी दामन झाड़ के निकला एक तरफ़
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    तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है
    मगर ये दुख कि मिरी उम्र-ए-राएगाँ कम है

    मिरी निगाह की वुसअत भी इस में शामिल कर
    मिरी ज़मीन पे तेरा ये आसमाँ कम है

    तुझे ख़बर भी कहाँ है मिरे इरादों की
    तू मेरी सोचती आँखों का राज़-दाँ कम है

    इसी से हो गए मानूस ताइरान-ए-चमन
    वो जो कि बाग़ का दुश्मन है बाग़बाँ कम है

    अगरचे शहर में फैली कहानियाँ हैं बहुत
    कोई भी सुनने-सुनाने को दास्ताँ कम है

    निगाह ओ दिल पे खुली हैं हक़ीक़तें कैसी
    ये दिल उदास ज़ियादा है शादमाँ कम है

    अब इस से बढ़ के भी कोई है पुल-सिरात अभी
    मैं जी रहा हूँ यहाँ जैसे इम्तिहाँ कम है
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    सितारा ले गया है मेरा आसमान से कौन
    उतर रहा है 'शुमार' आज मेरे ध्यान से कौन

    अभी सफ़र में कोई मोड़ ही नहीं आया
    निकल गया है ये चुप-चाप दास्तान से कौन

    लहू में आग लगा कर ये कौन हँसता है
    ये इंतिक़ाम सा लेता है रूह ओ जान से कौन

    ये दार चूम के मुस्का रहा है कौन उधर
    गुज़र रहा है तुम्हारे ये इम्तिहान से कौन

    ज़मीन छोड़ना फ़िलहाल मेरे बस में नहीं
    दिखाई देने लगा फिर ये आसमान से कौन
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    उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं
    मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं

    अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं
    उस को खो कर तो मिरे पास रहा कुछ भी नहीं

    चार दिन रह गए मेले में मगर अब के भी
    उस ने आने के लिए ख़त में लिखा कुछ भी नहीं

    कल बिछड़ना है तो फिर अहद-ए-वफ़ा सोच के बाँध
    अभी आग़ाज़-ए-मोहब्बत है गया कुछ भी नहीं

    मैं तो इस वास्ते चुप हूँ कि तमाशा न बने
    तू समझता है मुझे तुझ से गिला कुछ भी नहीं

    ऐ 'शुमार' आँखें इसी तरह बिछाए रखना
    जाने किस वक़्त वो आ जाए पता कुछ भी नहीं
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    Akhtar Shumar
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