tire baghair masafat ka gham kahaan kam hai | तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है

  - Akhtar Shumar

तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है
मगर ये दुख कि मिरी उम्र-ए-राएगाँ कम है

मिरी निगाह की वुसअत भी इस में शामिल कर
मिरी ज़मीन पे तेरा ये आसमाँ कम है

तुझे ख़बर भी कहाँ है मिरे इरादों की
तू मेरी सोचती आँखों का राज़-दाँ कम है

इसी से हो गए मानूस ताइरान-ए-चमन
वो जो कि बाग़ का दुश्मन है बाग़बाँ कम है

अगरचे शहर में फैली कहानियाँ हैं बहुत
कोई भी सुनने-सुनाने को दास्ताँ कम है

निगाह ओ दिल पे खुली हैं हक़ीक़तें कैसी
ये दिल उदास ज़ियादा है शादमाँ कम है

अब इस से बढ़ के भी कोई है पुल-सिरात अभी
मैं जी रहा हूँ यहाँ जैसे इम्तिहाँ कम है

  - Akhtar Shumar

Mashwara Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Akhtar Shumar

As you were reading Shayari by Akhtar Shumar

Similar Writers

our suggestion based on Akhtar Shumar

Similar Moods

As you were reading Mashwara Shayari Shayari