लरज़ उठा है मिरे दिल में क्यूँँ न जाने दिया

तिरा पयाम तो ख़ामोश सी हवा ने दिया

जला रहा था मुझे मैं ने भी जलाने दिया
उजाला उस ने दिया भी तो किस बहाने दिया

अभी कुछ और ठहर जाता मेरे कहने पर
वो जाने वाला था ख़ुद ही सो मैं ने जाने दिया

वो अपनी सैर के क़िस्से मुझे सुनाता रहा
मुझे तो हाल-ए-दिल उस ने कहाँ सुनाने दिया

मैं शुक्र उस का न कैसे अदा करूँ जानाँ
शुऊ'र मुझ को मोहब्बत का जिस ख़ुदा ने दिया

करम के पल में ये रौशन हुआ ब-हम्दिल्लाह
नहीं बुझेगा मिरा तुझ से ऐ ज़माने दिया

'शुमार' सामने उस के भी गुफ़्तुगू के वक़्त
जो रंग चेहरे पे आया था मैं ने आने दिया

— Akhtar Shumar

More by Akhtar Shumar

Other ghazal from the same pen

See all from Akhtar Shumar →

Beautiful Subah Shayari

Shers of beautiful subah.

All Beautiful Subah Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling