"ख़ामुशी"

सभी ने कहा दिल लगाना ग़लत है
मगर मैं ये समझा ज़माना ग़लत है
ये मेरी ख़ता है सज़ा भी मुझे दे
दुआ भी मुझे दे क़ज़ा भी मुझे दे

अगर हो सका तो कभी लौट कर भी
तुझे मैं मिलूँगा यहीं पर कहीं पर
मेरी ये जो दुनिया तेरे ही लिए थी
ले मैं छोड़ता हूँ तेरी सर-ज़मीं पर

मगर याद रखना मेरी आशिक़ी को
मेरे साथ गुज़री वो हर इक घड़ी को
मिलेंगे अगर हम कभी इस जहाँ में
तो फिर से सुनेंगे उसी ख़ामुशी को

वही ख़ामुशी जो हमारे लबों पे
मुलाक़ात के वक़्त आती थी अक्सर
वही ख़ामुशी जो हमारे दिलों में
नए प्यार के गीत गाती थी अक्सर

मुझे है ख़बर सब बदल सा गया है
मगर ख़ामुशी को ये कहते सुना है
चलो आज फिर से वही गीत गाएँ
चलो अपनी चाहत को फिर आज़माएँ

— Mukesh Jha

More by Mukesh Jha

Other nazm from the same pen

See all from Mukesh Jha →

Yaad Shayari

Shers of yaad.

All Yaad Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling