pata karo ki kah gaii hai kya hawa charaagh se | पता करो कि कह गई है क्या हवा चराग़ से

  - Mukesh Jha

पता करो कि कह गई है क्या हवा चराग़ से
है बात क्या जो इस तरह धुआँ उठा चराग़ से

उस इक हसीं बला से बस वही है राब्ता मेरा
है रूह का जो जिस्म और रात का चराग़ से

मेरी अना के बोझ से ये रिश्ता टूटता गया
हवा चली तो राब्ता नहीं रहा चराग़ से

मैं 'इश्क़ के धुएँ से ख़ुद को भी बचा नहीं सका
सियाह-पोश हो गया है आइना चराग़ से

ये और बात है कि दिल कहीं नहीं लगा मेरा
मैं दिन में ढूँढता रहा हूँ रास्ता चराग़ से

ये जिस्म काग़ज़ी है पर मुझे तो उस से 'इश्क़ है
भला मैं किस तरह रखूँगा फ़ासला चराग़ से

  - Mukesh Jha

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