पता करो कि कह गई है क्या हवा चराग़ से
है बात क्या जो इस तरह धुआँ उठा चराग़ से
उस इक हसीं बला से बस वही है राब्ता मेरा
है रूह का जो जिस्म और रात का चराग़ से
मेरी अना के बोझ से ये रिश्ता टूटता गया
हवा चली तो राब्ता नहीं रहा चराग़ से
मैं 'इश्क़ के धुएँ से ख़ुद को भी बचा नहीं सका
सियाह-पोश हो गया है आइना चराग़ से
ये और बात है कि दिल कहीं नहीं लगा मेरा
मैं दिन में ढूँढता रहा हूँ रास्ता चराग़ से
ये जिस्म काग़ज़ी है पर मुझे तो उस से 'इश्क़ है
भला मैं किस तरह रखूँगा फ़ासला चराग़ से
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