Mukesh Jha

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    जितना भी हम जिए उतने ही परेशान रहे
    हो गए ख़ाक तो भी दर्द से सोज़ान रहे

    ज़िन्दगी जी न सकूँगा कभी भी चैन से मैं
    मेरे सीने में अगर ज़िंदा ये अरमान रहे

    हम तलबगार-ए-रिहाई-ए-मुहब्बत थे मगर
    उम्र भर के लिए हम क़ैदी-ए-ज़िंदान रहे

    बुत-परस्ती का सिला तो हमें मिलना ही था
    साँस चलती थी मगर जिस्म से बे-जान रहे

    बादा-ए-नाब है ये ज़िन्दगी या ख़ून-ए-जिगर
    कोई बतला दे तो ता-उम्र ये एहसान रहे

    एक भी गुल न खिला मेरे इन अश्कों से कभी
    जाने कितने मेरी आँखों में बयाबान रहे

    मिस्ल-ए-तहरीर है ये हुस्न या मिस्ल-ए-नग़्मा
    जितना भी देखा तुझे उतने ही हैरान रहे
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    रंग गालों पे लगा रहने दो
    ख़ूब जँचता है ये गहना तुम पर
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    वादा करो कि हाथ छुड़ाकर न जाओगे
    वादा करो कि सात जनम तक रहेगा इश्क़
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    इतनी शोहरत तो मेरी आज भी इस शहर में है
    एक पत्ता न हिले मेरी इजाज़त के बग़ैर
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    वो राधा की तरह है साथ मेरे
    ख़यालों में वो मेरी रुक्मणी है
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    खींची जो उसने आँख में काजल की इक लकीर
    मैंने भी अपने सीने पे इक हाथ रख लिया
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    जितना था सब गँवा दिया मैंने
    इश्क़ भी, दोस्त भी, ज़माना भी
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    ले रहा था मैं ज़िन्दगी के मज़े
    फिर वो बोली कि अब मेरी बारी
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    मैं कहीं गुम हूँ आजकल शायद
    जल गए होंठ चाय पीते हुए
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    मैं कभी तेरे बराबर नहीं हो सकता दोस्त
    मैं तो मिट्टी हूँ सो पत्थर नहीं हो सकता दोस्त

    मैं तेरी आँख का आँसू तो हो सकता हूँ मगर
    मैं तेरी आँख का कंकर नहीं हो सकता दोस्त

    मेरी तासीर अलग है तेरी तासीर अलग
    मैं कभी तुझ सा सितमगर नहीं हो सकता दोस्त

    कितनों ने प्यास बुझाई है रवानी में मेरी
    चाह कर भी मैं समंदर नहीं हो सकता दोस्त

    मैं ज़ियादा से ज़ियादा तेरा हो भी जाऊँ
    तू मगर मुझको मयस्सर नहीं हो सकता दोस्त

    कम से कम इक दफ़ा तो तय है मुहब्बत में हार
    इश्क़ में कोई सिकंदर नहीं हो सकता दोस्त

    वो समझता है ग़लत मुझको हर इक बात पे पर
    ये यक़ीं है वो सितमगर नहीं हो सकता दोस्त

    ख़ुद को ख़ुद में ही छुपाए हुए फिरता हूँ यहाँ
    जितना अंदर हूँ मैं बाहर नहीं हो सकता दोस्त
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    Mukesh Jha
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