कभी मिलता नहीं क्यूँ मुझ को मुझ में
कहाँ है गर मेरे अंदर ख़ुदा है
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याद में तेरी खो कर हम ग़ज़ल बनाते हैं
आफ़ताब ढ़लता है जब ये शाम होती है
आफ़ताब ढ़लता है जब ये शाम होती है
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कभी देखा नहीं जिस ने बदन के आगे कुछ भी
भला वो क्यूँ मुहब्बत जावेदाना ढूँढ़ता है
भला वो क्यूँ मुहब्बत जावेदाना ढूँढ़ता है
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प्यार पर एक नज़्म लिख रहा हूँ
जिस में बातें तेरी-मेरी होगी
जिस में बातें तेरी-मेरी होगी
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