Prashant Prakhar

Top 10 of Prashant Prakhar

    मुझे वो ही नज़र आता जिधर मेरी नज़र जाए
    भला ऐसे में दिल उस को भुलाकर भी किधर जाए

    बड़े नादान हो गर इश्क़ को आसाँ समझते हो
    नशा ऐसा नहीं है ये जो पल भर में उतर जाए

    तसव्वुर में नज़र आता फ़क़त चेहरा मुझे जिस का
    सँवरने बैठ जाए वो तो आईना बिखर जाए

    मैं तन्हाई का मारा हूँ मेरा हाकिम मेरा महबूब
    बिना उस के छुए हालत मेरी कैसे सुधर जाए

    मुबारक हो अगर कुछ ग़म मुयस्सर हैं तुम्हें यारों
    उदासी ने भी जिस का साथ छोड़ा वो किधर जाए

    उसे कह दो नहीं होती कोई बंदिश मुहब्बत में
    मेरा हमराह चाहे छोड़कर जाना अगर जाए

    लुटी है बाग़ की ख़ुशबू लुटी है ज़ीस्त की रौनक़
    करो सब इल्तिजा मौसम ये जल्दी से गुज़र जाए
    Read Full
    Prashant Prakhar
    9
    1 Like
    वो जो शबों में रौशनी था क्या हुआ
    जो शख़्स तेरी ज़िंदगी था क्या हुआ

    इक राह-रौ ने राह बदली ख़ैरियत
    अच्छा भला जो अजनबी था क्या हुआ
    Read Full
    Prashant Prakhar
    8
    1 Like
    क्या बताऊँ क्या हुनर था बाग़बाँ में
    क्या महक घोली हवा-ए-गुलसिताँ में

    जिन के दिल में जुगनुओं सी रौशनी थी
    आज बन तारे सजे हैं आसमाँ में

    राह चलते जाने कितने शख़्स बदले
    सब मेरे हमदर्द ही थे कारवाँ में

    घर उजड़ने का मैं उस दिन दर्द समझा
    जब लगी ख़ुद आग मेरे आशियाँ में

    आज तक इस बात पर हैरान हूँ मैं
    था फ़क़त किरदार तेरी दास्ताँ में
    इश्क़ में था हार भी मंज़ूर लेकिन
    आ सके अव्वल नहीं इस इम्तिहाँ में

    वो बहुत ख़ामोश रहता है हमेशा
    है अजब सी बात तेरे हम-ज़बाँ में
    Read Full
    Prashant Prakhar
    7
    1 Like
    हम ने चाहा नहीं ये न हो वो न हो
    तुम हमारे रहो हो न हो हो न हो

    आज दुनिया क़दम चूमती फिर रही
    हो सके कल हमारी तवज्जोह न हो

    तुम कहाँ के बचोगे बताओ ज़रा
    कल अगर इश्क़ से इश्क़ मुझ को न हो

    ऐश की ज़िंदगी हर किसी की दुआ
    काश ऐसा कभी शौक़ तुम को न हो
    इश्क़ के खेल में फिर न कोई मज़ा
    हार इस
    में तुम्हारी अगर जो न हो
    Read Full
    Prashant Prakhar
    4
    1 Like
    हादसा ख़ैर कोई हुआ भी नहीं
    वो गया और दिल से गया भी नहीं

    आशिक़ी ने दिए तोहफ़े में मुझे
    ज़ख़्म ऐसे कि जिन की दवा भी नहीं

    चाँद इक रोज़ ऐसे गया रूठ कर
    इस गली में कभी फिर दिखा भी नहीं

    मैं उसे क्या कहूँ तुम बताओ कि वो
    छोड़कर भी गया बे-वफ़ा भी नहीं
    Read Full
    Prashant Prakhar
    3
    1 Like
    आसमाँ को चूम कर आया ज़मीं पर
    जीत आया मैं जहाँ तेरे यक़ीं पर

    अस्लियत में मैं तुम्हारा था दिवाना
    कह दिया तुम ने मुझे पागल कहीं पर

    रास्ते आ कर जहाँ मिलते सभी हैं
    लोग अक्सर छूट जाते हैं वहीं पर

    दस्तकें दर पर तिरे देता रहा मैं
    ज़िंदगी भर दर-ब-दर भटका नहीं पर

    ज़ख़्म तुम ने जो दिए भरते नहीं थे
    क्यूँ चलाया आज फिर ख़ंजर हमीं पर

    दिल है मेरा या फ़क़त शीशा है कोई
    जो भी चाहे तोड़ देता है कहीं पर
    Read Full
    Prashant Prakhar
    2
    1 Like
    रुलाएगी बहुत ये ज़िंदगी इक दिन
    करेगा फिर ख़ुदा की बंदगी इक दिन

    यही था इक मुदब्बिर ने कहा मुझ से
    डुबा देगी तुझे ये आशिक़ी इक दिन

    ख़ुदा के सामने तू हाथ फैला दे
    बुझा देगा वो तेरी तिश्नगी इक दिन

    ज़रा सी दोस्ती सूरज से कर ले तू
    मिटा देगा कभी वो तीरगी इक दिन

    मिलेगा जब तुझे कोई भला राही
    बदल देगा वो तेरी ज़िंदगी इक दिन

    तू कर ले आप ही से दिल-लगी वर्ना
    भुला देगी तुझे ये रफ़्तगी इक दिन
    Read Full
    Prashant Prakhar
    1
    1 Like