Prashant Prakhar

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@PPrakhar

Prashant Prakhar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Prashant Prakhar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जतन भी देखे शिकस्तगी भी सुकून पाया ज़फ़र जो देखा नए परिंदों के पंख देखे हुआ अचंभा हुनर जो देखा — Prashant Prakhar
देखिए तो भुखमरी ये और गंदी बस्तियाँ भी देश की हालत वही आईं गईं सरकार कितनी — Prashant Prakhar
हम कहाँ थे रूबरू ढलती हुई इस उम्र से हम न जाने छोड़ आए ज़िंदगी किस राह में — Prashant Prakhar
यूँँ उदासी बिछड़ कर गई सिसकियाँ राह तकती रही — Prashant Prakhar
मुझे नहीं था कभी भी लेकिन ख़ुदा पे उस दिन हुआ भरोसा दुआ की अगली घड़ी ही मैं ने दुआ का थोड़ा असर जो देखा — Prashant Prakhar
फटकारती हैं रोज़ मेरी माँ मुझे ठहरा निकम्मा मैं सुधरता ही नहीं — Prashant Prakhar

Ghazal

दोस्तो किस को ख़बर है वक़्त की रफ़्तार कितनी दोस्ती-ओ-दुश्मनी के दरमियाँ दीवार कितनी आज मंज़िल पर खड़ा हूँ तो सगा मैं हर किसी का क्या बताऊँ दर-ब-दर मुझ को मिली दुत्कार कितनी लुट रही फूलों की ख़ुशबू बाग़बाँ ख़ामोश बैठे और देखो ज़ालिमों की क्यारियाँ गुलज़ार कितनी इक दफ़ा जब से गई है बाल गीले वो झटककर हो रही है खिड़कियों से नूर की बौछार कितनी रंगतें उड़ने लगी हैं झुर्रियाँ पड़ने लगी हैं हो चुकी माँ-बाप की भी अब कमर लाचार कितनी खोजते फिरते हो क्यूँँ वीरानियों में लोग तन्हा आओ देखो महफ़िलों में इन की है भरमार कितनी — Prashant Prakhar
मुझे वो ही नज़र आता जिधर मेरी नज़र जाए भला ऐसे में दिल उस को भुलाकर भी किधर जाए बड़े नादान हो गर इश्क़ को आसाँ समझते हो नशा ऐसा नहीं है ये जो पल भर में उतर जाए तसव्वुर में नज़र आता फ़क़त चेहरा मुझे जिस का सँवरने बैठ जाए वो तो आईना बिखर जाए मैं तन्हाई का मारा हूँ मेरा हाकिम मेरा महबूब बिना उस के छुए हालत मेरी कैसे सुधर जाए मुबारक हो अगर कुछ ग़म मुयस्सर हैं तुम्हें यारों उदासी ने भी जिस का साथ छोड़ा वो किधर जाए उसे कह दो नहीं होती कोई बंदिश मुहब्बत में मेरा हमराह चाहे छोड़कर जाना अगर जाए लुटी है बाग़ की ख़ुशबू लुटी है ज़ीस्त की रौनक़ करो सब इल्तिजा मौसम ये जल्दी से गुज़र जाए — Prashant Prakhar
अपना मैं क्यूँँ न समझूँ मेरे हबीब तुम हो रिश्ता है ये पुराना पिछला नसीब तुम हो कहने को यूँँ तो मुझ सेे तुम ख़ूब दूर लेकिन कोई नहीं है उतना जितने क़रीब तुम हो बरसों से आशिक़ी का तन्हा मरीज़ हूँ मैं हालत सुधर रही है दिल के तबीब तुम हो तुम बात-बात पर जो लेते हो नाम उस का अक्सर मुझे है लगता मेरे रक़ीब तुम हो झेले हैं दर्द लाखों उफ़ की नहीं ज़रा सी कैसे कहे न कोई मालिक अजीब तुम हो दामन से मैं ने अपने बिखरा दिया उजाला सब देख कर ये हुलिया बोले ग़रीब तुम हो यूँँ तो मुझे गिला है अपनी ही ज़िंदगी से इतनी सी बस ख़ुशी है मेरा नसीब तुम हो — Prashant Prakhar