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ग़मों को मिरे जो गिना जा रहा हैं
कि मशग़ूल हो के सुना जा रहा हैं
कि मशग़ूल हो के सुना जा रहा हैं
मिरी हैं ये किस्मत या फिर सजा हैं
कि क़ातिल मुझी से चुना जा रहा हैं
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अब हमें इस सफ़र से निकलना हैं
कुछ दिनों बा'द घर से निकलना हैं
कुछ दिनों बा'द घर से निकलना हैं
हैं नदामत इलाही , रहम बरसा
इस ख़ुदा-ए-कहरस निकलना हैं
चूम लूँ हाथ बे- ख़ौफ़ उस के बस
ऐ वबा तेरे डर से निकलना हैं
रात के ख़्वाब जो याद देती हैं
बस मुझे उस सहरस निकलना हैं
याद कूचा -ए- जाँ पाँव को आए
अब मुझे इस शहर से निकलना हैं
तू हैं 'दीदार' , वो मुंतज़िर फिर भी ?
बद-अहद इस नजर से निकलना हैं
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हवा को ख़रीद'ने के लाले पडे हैं
हमारे कयामत से पाले पड़े हैं
हमारे कयामत से पाले पड़े हैं
हैं खायी वतन ने बहुत ठोकरें भी
मगर इस दफा पा में छाले पड़े हैं
अचानक लगी आग शमशान में क्या
कि इतनें शहर में उजाले पड़े हैं
निभाते नहीं तुम रँलीओं के वादे
तुम्हारी जबानों पें ताले पड़े हैं
हुआ हैं बड़ा अर्सा दोस्तों से मिल के
हैं ख़ाली खनकते जो प्याले पड़े हैं
सबब और फिर क्या जुदाई का पूछूँ
कि कानों से झुमके निकाले पडे हैं
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