Sana Hashmi

Top 10 of Sana Hashmi

    इश्क़ की इन्तिहा जानता है ये दिल
    हद से बढ़ने की ज़िद ठानता है ये दिल

    लाख कोशिश की फिर भी न भूले उसे
    बात मेरी कहाँ मानता है ये दिल

    मुड़ के देखा न जिस ने कभी हिज्र में
    ख़ाक उस की ही क्यूँ छानता है ये दिल

    जिस की ख़ातिर गिरी ठोकरें खा के मैं
    आसरा भी उसे मानता है ये दिल

    अनसुनी कर रहा है वो मेरी सदा
    जिस की आहट भी पहचानता है ये दिल

    रंग चहरे का उस के बदल जाए है
    जब नज़र उस तरफ़ तानता है ये दिल

    क्यूँ सना से भला वो अदावत करे
    जब किसी को न गर्दानता है ये दिल
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    Sana Hashmi
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    वो मेरी ज़िंदगी का अधूरा सा ख़्वाब है
    मैं ख़ाक हूँ ज़मीं की वो इक माहताब है

    ता'बीर जिस की मेरी समझ में न आ सकी
    आँखों में मेरी आज भी इक ऐसा ख़्वाब है

    रौशन है ज़ीस्त मेरी फ़क़त दम से उस के ही
    मेरे लिए फ़लक का वही आफ़ताब है

    मिलने से उस के मुझ को मिली सारी क़ाएनात
    मेरी इबादतों का वो वाहिद सवाब है

    पढ़ कर अगर वो ग़ौर से देखे कभी मुझे
    उस के हर इक सवाल का मुझ
    में जवाब है

    उस से बिछड़ने का मैं तसव्वुर भी क्यूँ करूँ
    जिस के बग़ैर जीना यक़ीनन अज़ाब है

    कुछ इस लिए भी उस की है क़ीमत बढ़ी हुई
    आख़िर को वो सना का हसीं इंतख़ाब है
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    Sana Hashmi
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    मुझे शिद्दत से तोड़ा है किसी ने
    दिल-ए- हमचश्म जोड़ा है किसी ने

    क़दम बढ़ते नहीं मंज़िल की जानिब
    मुझे रस्ते में छोड़ा है किसी ने

    मिरे अरमान अब ज़िन्दा न होंगे
    गला इनका मरोड़ा है किसी ने

    जो मरते थे मिरी आँखों पे हरदम
    इन्हीं से मुँह को मोड़ा है किसी ने

    मिरे हाथों पे जो मेहँदी रची है
    लहू दिल का निचोड़ा है किसी ने

    फ़क़त साँसे ही अब चलती है मेरी
    बना के लाश छोड़ा है किसी ने

    सना गुलशन में अब ढूँढ़े सनम को
    गुल ए दिल को झिंझोड़ा है किसी ने
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    वफ़ादारी सभी करते नहीं हैं
    सभी कंधों पे सर धरते नहीं हैं

    विसाले यार की ख़्वाहिश थी जिन को
    फ़िराक़े यार में मरते नहीं हैं

    कभी अग़्यार की महफ़िल में देखो
    हमारा ज़िक्र वो करते नहीं हैं

    कुछ ऐसे ज़ख़्म सीने में दबे हैं
    उभरते हैं मगर भरते नहीं हैं

    हमारे सिर पे साया है ख़ुदा का
    किसी काफ़िर से हम डरते नहीं हैं

    नबी-ए-पाक पर जो जाँ लुटा दें
    वो मर कर भी कभी मरते नहीं हैं

    ये रब की मस्लिहत बस रब ही जाने
    सना उस पर शुबा करते नहीं हैं
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    बिखरी है मईशत ये सँवारी तो नहीं है
    ख़ुशफ़हमियों पे जान निसारी तो नहीं है

    मैं सबकी तरह कैसे चलूँ एक ही रस्ता
    भेड़ों में भला मेरी शुमारी तो नहीं है

    ग़ैरत भी गँवा दूँ मैं फ़क़त जीने की ख़ातिर
    ये ज़ीस्त मुझे इतनी भी प्यारी तो नहीं है

    हर बार दु'आओं में तुझे माँगा है रब से
    है इश्क़ यही वक़्त-गुज़ारी तो नहीं है

    कब कौन भला फ़ाँस दे किस जाल में तुझ को
    इस दश्त में इक तू ही शिकारी तो नहीं है

    शोहरत के ज़रा मिलने से क्या बदले हैं तेवर
    नश्शा है तक़ब्बु का ख़ुमारी तो नहीं है

    कमज़ोर भी कमतर भी समझता है ज़माना
    नाज़ुक है सना कोई बिचारी तो नहीं है
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    Sana Hashmi
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    रेज़ा रेज़ा लम्हा लम्हा घट रही है ज़िंदगी
    जानते सब हैं हक़ीक़त आरज़ी है ज़िंदगी

    लग रहा है कोई अपना ही नहीं जैसे यहाँ
    साथ ग़ैरों के हमारी यूँ कटी है ज़िंदगी

    आते जाते मरहले ही उन्सियत को खा गए
    कोफ़्त में गुज़रे, यक़ीनन तीरगी है ज़िंदगी

    सब खिलाड़ी हार बैठे बाज़ियाँ अपनी यहाँ
    खेल भी क्या क्या निराले खेलती है ज़िंदगी

    रब से ग़ाफिल जो हुए तो, रंज-ओ-ग़म ही पाओगे
    ऐन मुमकिन ख़्वार होना लाज़मी है ज़िंदगी

    जो लकीरें देख कर दावा ख़ुदाई का करे
    चल नजूमी ये बता, कितनी बची है ज़िंदगी

    ख़ूब उजड़ा ख़ूब सँवरा आफ़तों से ये जहान
    ता'क़यामत ऐ 'सना' ये आख़िरी है ज़िंदगी
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    यकायक यूँ उन का नज़र में समाना
    गिले क्या भुला देते हैं हम ज़माना

    मुझे चाहते हैं वो अपना बनाना
    है मुश्किल बहुत मेरे नखरे उठाना

    शिकायत करूँ क्या तुम्हीं से तुम्हारी
    तुम्हें तो फकत आता है दिल दुखाना

    जुड़ी तुझ से राहें तू मंज़िल है मेरी
    सनम तेरा दिल अब है मेरा ठिकाना

    ये दुनियावी रस्में वो सब जानता है
    नहीं जानता है मुहब्बत जताना

    तेरे बिन बहारें भी बे-रंग गुज़री
    तेरे संग पतझड़ भी गुज़रा सुहाना

    कि ता'उम्र मंसूब तुझ से रहूँ मैं
    ये बेसाख्ता तुझ को चाहूँ बताना

    कहीं टूट जाए न दिल फिर सना का
    नहीं होता आसान वादे निभाना
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    हौसला बिगड़े हालात में चाहिए
    हर कदम पर ख़ुदा साथ में चाहिए

    ज़िंदगी भी तेरे साथ में चाहिए
    हाथ तेरा मेरे हाथ में चाहिए

    चाँद तारों से मेरा गुज़ारा नहीं
    मुझ को तो शम्स भी रात में चाहिए

    उड़ के गिरने से बेहतर है इंसान को
    उम्र भर रहना औक़ात में चाहिए

    सब मुख़ालिफ़ हो लहजे से क़ाइल मेरे
    ऐसी तासीर अब ज़ात में चाहिए

    जो मेरे तज़्किरों का है मरकज़ बना
    बस वही ज़िक्र हर बात में चाहिए

    सना मत बनो इतनी हस्सास तुम
    ज़ब्त भी थोड़ा ज़ज्बात में चाहिए
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    Sana Hashmi
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    ये दुनिया ग़र बने दुश्मन, तो मैं परवा नहीं करती
    हर इक मौज़ू पे लफ़्ज़ अपने, कभी ज़ाया' नहीं करती

    सभी बहती हुई गंगा में, अपने हाथ धोते है
    ज़माने ने किया है जो, मैं काम ऐसा नहीं करती

    निकल जाता है जब फिर साँप, तो पीटे लकीरें सब
    किसी फ़र्ज़ी मुहिम का मैं बना हिस्सा नहीं करती

    यहाँ अक़्सर सभी छुप कर तसल्ली देते रहते हैं
    न खुल कर साथ दे पाऊँ, तो फिर दावा नहीं करती

    सबब है बस यही तो सरबुलंदी का मिरी यारों
    सिवा रब के किसी के सामने सजदा नहीं करती

    यक़ीनन मौत बरहक़ है, तो फिर मरने से क्या डरना
    सना बेख़ौफ़ सच कहने से, घबराया नहीं करती
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    Sana Hashmi
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    महाज़-ए-जंग में लश्कर का दस्ता टूट जाता है
    मुसल्लह सामने हो तो निहत्था टूट जाता है

    सफ़र की मुश्किलों से बस मुसाफ़िर ही रहे वाकिफ़
    बदन और हौसले के साथ क्या क्या टूट जाता है

    तअल्लुक़ को तहम्मुल से निभाना है बहुत लाज़िम
    ज़रा सी भूल से मज़बूत रिश्ता टूट जाता है

    मिसाल ए ज़िंदगी जीना सलीक़े मंद ही जाने
    कि बेतरतीब होने से क़रीना टूट जाता है

    सरापा ढाँप लेना ही फ़क़त काफी नहीं होता
    कोई आवाज़ भी सुन ले तो पर्दा टूट जाता है

    मुसलसल आज़माइश में घिरे रहने से लोगों का
    दु'आओं हिकमतों पर से अक़ीदा टूट जाता है

    समुंदर के बवंडर से 'सना' मोहतात ही रहना
    किनारे तक पहुंचने में सफ़ीना टूट जाता है
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