नींद से क्यों मिरी दुश्मनी हो गई
    ऐसी कैसी मुझे दिल-लगी हो गई

    इस तरह ख़ुद को उसमें मिला बैठा मैं
    पूरी दुनिया ही ये अजनबी हो गई

    सारी दुनिया से किस तर्ज़ पर मैं लड़ूँ
    उसके ही साथ में जब कमी हो गई

    है मिरी नींदों का बस उसी से वुजूद
    उसके बिन ये भी नाराज़ सी हो गई

    मैंने आँखें डुबों दी गले माँ से लग
    माँ की आँखों में भी फिर नमी हो गई

    मैंने तो गुफ़्तगू उससे यूँ ही की थी
    जाने कब वो मिरी ज़िन्दगी हो गई

    उसके आगे मैं सर भी झुका लेता हूँ
    रब की मानों यहीं बंदगी हो गई

    हाँ लिया देख सब कुछ दुबारा मैं ने
    उसकी सब ग़ज़लों में हाजरी हो गई

    इतना कस के लगा उसके सीने से मैं
    उसकी, अंदर मिरे ख़ुशबू सी हो गई
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    Deep kamal panecha
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    "मेरी ज़िंदगी तेरे नाम"
    रेज़ा रेज़ा मुझे अपनी साँसें फ़क़त तेरे हवाले करनी है
    तू जहाँ अपना पैर रखे वहाँ मुझे अपनी जबीं धरनी है
    तेरे बाहें मेरे गले का हार हो, तेरी ख़ुश्बू लिखने के अश'आर हो
    ऐसे ही मैं जान-ए-ज़िगर जीता रहूँ ऐसे ही ज़िन्दगी पार हो

    एक बाग़ सी हसीन होगी अपनी दुनिया
    उसमें तेरे मेरे माँ-पापा बरगद के पेड़ जैसे
    सबसे बूढ़े सबसे उम्र-दराज़ और अनुभव
    उनके इन्हीं गुण होंगे जैसे उनकी शाख़ें
    ये शाख़ें पूरे के पूरे बाग़ को छाँव देगी
    बाग़ में अपने जज़्बातों के छोटे फूल होंगे
    चंद कलियाँ मनचली की होगी जानाँ
    तो कुछ कलियाँ दिलबरी की होगी
    एक एक फूल अपने जज़्बात से खिलेगा
    इतना ज़ियादा इश्क़ तुझे कहाँ मिलेगा
    मैं चाहता हूँ अपने मरने के बाद भी आबाद रहें
    ऐसी दास्ताँ हो अपनी कि सबको ज़बानी याद रहें

    तेरे जिस्म की हर लकीर को मैं पढूँ
    और तू इस पर शान से नाज़ उठाए
    सुब्ह तू आइने के सामने खड़ी हो कर
    मेरे आगे हाथ में सिंदूर, सूनी माँग लाए
    मैं अपने हाथों से तेरी माँग भरूँ
    और तू इतनी ख़ूबसूरत लगेगी
    तुझे देख के जहाँ की हर लड़की
    सुहागन बनने की दुआ करेगी

    रोज़ शाम को मैं तेरा दामन ओढ़ कर सो जाऊँ
    ख़ुदा भी तुझसे रश्क करें इतना तेरा हो जाऊँ
    मेरी सारी बे-चैनियाँ तुझसे लिपट के सुकूँ हो जाएगी
    तेरी सारी परेशानियाँ मैं अपने सर पर तार लूँगा
    तू अव्वल तेरा हर दाव, ख़ुशी हर चीज़ मेरे लिए अव्वल
    तेरी परेशानियों संग मैं अपनी ज़िंदगी हँसते गुज़ार लूँगा
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    ये सर्दी के मौसम की बारिश
    मिरी ही है शायद गुज़ारिश

    न आए कहीं चैन मुझ को
    सो बरसात ने की है साज़िश

    रहे तू सदा साथ मेरे
    ये मेरी ग़ज़ल की है ख़्वाहिश

    कमर पे दिया तिल ख़ुदा ने
    तिरे हुस्न की, की नुमाइश

    खफ़ा करती कह के मुझे झूट
    जुदा करने की करती साज़िश

    ये क्यूँ करते हो पूछा मैंने
    कहें आदतों की है वर्ज़िश

    मुझे रहना है उसके दिल में
    लगातार करता हूँ कोशिश

    यक़ीं कैसे ख़ुद पे दिलाऊँ
    वो तोड़े ज़रा अपनी बंदिश

    वो इक बार अपना कहें बस
    करूँगा उमर भर परस्तिश

    ज़रा देख इसमें उतर के
    मुहब्बत बड़ी प्यारी लग़्ज़िश

    नहीं बात की आज उससे
    है कुछ "दीप" के दिल में रंज़िश
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    बारिश ये इतनी हँस रही है तो सही
    हर एक बादल में नमी है तो सही

    आलम ये मेरी आरज़ू ही तो है एक
    ये आरज़ू मेरी सजी है तो सही

    बेचैन बैठा हूँ मैं इस तन्हाई में
    इसमें तुम्हारी इक कमी है तो सही

    अच्छा मुहब्बत आह इक बीमारी हैं
    बीमारी ये मुझ को लगी है तो सही

    क्या, "दीप" को वहशी कहा है तुम ने ही
    बुद्धि तुम्हारी ये सही है तो सही
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    टूट-फूट कर हर दम अब बिखर चुका हूँ मैं
    हर सितम जहान-ए-ग़म से गुजर चुका हूँ मैं

    है नहीं मेरे ख़्वाबों मे ख़याल अब तेरा
    क्या गिला किसी से आहिस्ता मर चुका हूँ मैं

    सोच में हो तुम हर दम मेरे यानी सब कुछ हो
    वाकई तो कैसे तुम से उतर चुका हूँ मैं

    रूह ख़्वाब साँसे धड़कन ख़्याल सब मेरे
    सिर्फ़ नाम पे तेरे जानाँ धर चुका हूँ मैं

    मुझ को मुहब्बत में चाहते हो करना ख़त्म
    पहले भी जाँ इस रस्ते से गुज़र चुका हूँ मैं

    पास मत रहो चाहे दूर भी चले जाओ
    पर तुम्हें तो अपनी पलकों में भर चुका हूँ मैं

    बस नहीं मेरा नफरत करना चाहूँ गर तुम से
    ख़ुद को इश्क़ में पागल इतना कर चुका हूँ मैं

    चलना ही पड़ेगा अब उसके गाँव की ज़ानिब
    मौत के लिए ख़ुद ही जो सँवर चुका हूँ मैं

    ज़िन्दगी में काफी है बस सुख़न-वरी मुझ को
    बाक़ी सारी इस दुनिया से मुकर चुका हूँ मैं

    दोस्त उम्र भर पछताना मुझे पड़ेगा ही
    दीप को जुदा ख़ुद से कर अगर चुका हूँ मैं
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    कहीं मैं जा के नदी में डुबा दूँ क्या ख़ुद को
    या फिर मैं आग की लौ में जला दूँ क्या ख़ुद को

    सताओ मत मुझे इतना भी ऐ मिरे अपनों
    मैं जंग में कहीं जा के कटा दूँ क्या ख़ुद को

    मैं पूछता हूँ ये थक हार के तुम्हें जानाँ
    मैं मेरी मौत से सीने लगा दूँ क्या ख़ुद को

    करार-ए-दिल न कभी साथ होगा तू मेरे
    तो साँस लेने से भी अब थका दूँ क्या ख़ुद को

    हाँ चुभता है मुझे महबूब का बुरा लहजा
    सो बुझती लौ की तरह मैं बुझा दूँ क्या ख़ुद को

    ये ज़िन्दगी तो मुहब्बत ही है मुहब्बत बस
    मोहब्बतों से भी अब क्या छुपा दूँ क्या ख़ुद को

    उसी ने की है यहाँ बे-वफ़ाई उल्फ़त में
    तो उसके नाम पे मैं अब मिटा दूँ क्या ख़ुद को
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    Deep kamal panecha
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    शब-ए-फ़िराक़ पूरी रात सोना चाहिए हमें
    मगर ये क्या सितम तिरे ख़याल बो रहे हैं हम

    शब-ए-विसाल पूरी रात जगना चाहिए हमें
    मगर ये क्या सितम सुकूँ की नींद सो रहे हैं हम
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    मैंने माँगा फ़क़त अपने हक़ का ही है
    'दीप' तो तेरे दर पे सवाली नहीं
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    कम हो गईं ख़्वाबों से बाते आज कल
    शायद मिरे अंदर का मैं ही मर गया
    Deep kamal panecha
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    मुस्कान ये उनकी, गज़ब हैरानी हैं
    बच्चों सी हरकत करती भी शैतानी हैं

    अब जो लिया हैं एक सफ़्हा हम ने फिर
    इक और "ग़ज़ल-ए-दीप" उस पर आनी हैं

    वो हँसते-हँसते ताली देते हैं हमें
    ये कैसी-कैसी करते वो नादानी हैं

    बेहद मुहब्बत हैं हमें उस शख़्स से
    बस बात ये ही हर ग़ज़ल में आनी हैं

    वो करती रहती तंज़ पैहम हम पे हैं
    वो भी हमारी लगता हैं दीवानी हैं

    मिलने न आए वो हमें इक बार फिर
    ये भी मुहब्बत दूर हम से जानी हैं
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    Deep kamal panecha
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