मुस्कान ये उनकी, गज़ब हैरानी हैं
बच्चों सी हरकत करती भी शैतानी हैं
अब जो लिया हैं एक सफ़्हा हम ने फिर
इक और "ग़ज़ल-ए-दीप" उस पर आनी हैं
वो हँसते-हँसते ताली देते हैं हमें
ये कैसी-कैसी करते वो नादानी हैं
बेहद मुहब्बत हैं हमें उस शख़्स से
बस बात ये ही हर ग़ज़ल में आनी हैं
वो करती रहती तंज़ पैहम हम पे हैं
वो भी हमारी लगता हैं दीवानी हैं
मिलने न आए वो हमें इक बार फिर
ये भी मुहब्बत दूर हम से जानी हैं
Read Full