सालिम पनाहें कोई छोड़ेगा क्यूँ मगर हम
लाचार हो के तेरी बाँहों से आज निकले
लाचार हो के तेरी बाँहों से आज निकले
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सहराओं से उत्कट रवानी की तरफ़
मैं चल दिया हूँ आज पानी की तरफ़
मैं चल दिया हूँ आज पानी की तरफ़
हाथों से बजरी सा फिसलता जा रहा
है बढ़ रहा बचपन जवानी की तरफ़
ये उम्र ही तो है मोहब्बत करने की
मैं जा रहा हूँ इक दिवानी की तरफ़
दौलत की जिस-जिस को भी ताक़त मिल गई
वो बढ़ रहा है हुक्मरानी की तरफ़
हम इम्तिहाँ भी ले चुके हैं उस का और
अब बढ़ना होगा जावेदानी की तरफ़
अब मुल्क में ग़ुर्बत भी छाने वाली है
है ही नहीं कोई किसानी की तरफ़
इंसानियत का मरना तो ज़ाहिर ही है
सब जा रहे हैं बद-गुमानी की तरफ़
जो सुन के दिल महसूस कर पाए चलो
इक ऐसी ही अफ़ज़ल कहानी की तरफ़
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जब से उन से दुआ-सलाम हो गया
मेरी ख़ल्वत का इंतिज़ाम हो गया
मेरी ख़ल्वत का इंतिज़ाम हो गया
मुझ से कहता था दिल वफ़ा निभाऊँगा
अब किसी और का ग़ुलाम हो गया
जो हमारी नमक-हलाली करता था
आज वो ही नमक-हराम हो गया
पहले आती थी याद वो कभी-कभी
सिलसिला अब ये सुब्ह-ओ-शाम हो गया
मैं मोहब्बत में सरफ़राज़ था कभी
बैर कर के मैं शख़्स-ए-आम हो गया
हार कर इश्क़ में हयात बार-बार
मिस्ल-ए-फ़रहाद-ओ-क़ैस नाम हो गया
पहले तो दुनिया में मिरा कोई न था
फिर 'मिलन' आलम-ए-तमाम हो गया
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इश्क़ उस से ही करूँगा मेरे मर जाने तक
वो मेरा हो या न हो उम्र गुज़र जाने तक
वो मेरा हो या न हो उम्र गुज़र जाने तक
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रईसों के गले में मोतियों का नूर-पाश है
नसीब सीपों के लिखा गया ये सर्वनाश है
नसीब सीपों के लिखा गया ये सर्वनाश है
समंदरों को भान है सुनामी कब कहाँ उठे
सुनामी उठ गई अगर विनाश ही विनाश है
भरोसे का मकान कच्ची ईंटों से बना हुआ
हवा से हिल गया बिख़र गया तो पाश-पाश है
जहाँ मसर्रतों की बारिशें कभी नहीं हुईं
वहाँ का आम आदमी भी हो चुका हताश है
यहाँ किसी भी बद-म'आश के लिए जगह नहीं
हमारा मीर ही लुटेरा और ख़ुश-म'आश है
खुशामदें यहाँ के हुक्मरानों को हैं चाहिए
यहाँ का नेक-दिल हबी भी साहिब-ए-फ़िराश है
न जाने कब से आ रहा चला रिवाज़-ए-कत्ल है
न जाने कब ये बन गया रिआया का म'आश है
यहाँ की धूप जानलेवा होती जा रही 'मिलन'
हमें किसी अनोखे से दरख़्त की तलाश है
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