न उन लबों पे तबस्सुम न फूल शाख़ों पर
    गुज़र गए हैं जो मौसम गुज़रने वाले थे
    Kaif Uddin Khan
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    हादसे ने किया जुदा हमको
    मौत ने देर कर दी आने में
    Kaif Uddin Khan
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    दिल जब उसकी अमान से निकला
    समझो मैं इम्तिहान से निकला

    एक शिकवा था आख़िरश वो भी
    शेर होकर ज़बान से निकला

    अपना सारा बचा कुचा नुक़सान
    ज़िंदगी की दुकान से निकला

    मैं मुसलसल सुकूत सुनता रहा
    और लहू मेरे कान से निकला

    पहले निकला मैं ख़ुल्द से और फिर
    दिल से निकला जहान से निकला

    चार-सू घर मैं ढूँढ़ने के लिए
    रोज़ रुसवा मकान से निकला
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    Kaif Uddin Khan
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    हमारा इल्म बूढ़ा हो रहा है
    किताबें धूल खाती जा रही हैं
    Kaif Uddin Khan
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    आशना किरदार उसका ज़ेहन पे यूँ नक़्श था
    रंग काग़ज़ पर गिरे तो ख़ुद अयाँ होते गए
    Kaif Uddin Khan
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    गुज़रते वक़्त के मानिंद है जो
    मेरी आँखें उसी को ढूँढती हैं
    Kaif Uddin Khan
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    इश्क़ जिसको सभी समझते हैं
    वहम है लज़्ज़त-ए-रसाई का
    Kaif Uddin Khan
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    उसको फ़िराक़-ए-यार का मतलब नहीं पता
    मतलब उसे भी प्यार का मतलब नहीं पता

    मरना तो चाहते हैं मगर क्या करें कि जब
    साँसों को इख़्तियार का मतलब नहीं पता

    मुझको भी अब यक़ीन किसी बात पर नहीं
    उसको भी एतबार का मतलब नहीं पता

    रखते हो तुम हिसाब ग़म-ए-ज़िंदगी का जो
    क्या तुमको बेशुमार का मतलब नहीं पता

    उससे गिला करें भी अगर हम तो किस लिए
    जिसको कि ग़म-गुसार का मतलब नहीं पता

    गो कर रहा है गुल की हिफाज़त शजर, मगर
    पतझड़ को नौ-बहार का मतलब नहीं पता

    अहद-ए-वफ़ा-ए-यार का मतलब पता है पर
    बाद-ए-फ़िराक़-ए-यार का मतलब नहीं पता
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    Kaif Uddin Khan
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    थे बदन में क़ैद अपने हम सभी
    कुन ख़ुदा ने हमको कहकर खींचा है
    Kaif Uddin Khan
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    परिंदा ग़र न उड़ सके नहीं सही
    क़फ़स को तोड़ के मरे ख़ुदा करे
    Kaif Uddin Khan
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