न उन लबों पे तबस्सुम न फूल शाख़ों पर
गुज़र गए हैं जो मौसम गुज़रने वाले थे
गुज़र गए हैं जो मौसम गुज़रने वाले थे
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दिल जब उस की अमान से निकला
समझो मैं इम्तिहान से निकला
समझो मैं इम्तिहान से निकला
एक शिकवा था आख़िरश वो भी
शे'र होकर ज़बान से निकला
अपना सारा बचा कुचा नुक़सान
ज़िंदगी की दुकान से निकला
मैं मुसलसल सुकूत सुनता रहा
और लहू मेरे कान से निकला
पहले निकला मैं ख़ुल्द से और फिर
दिल से निकला जहान से निकला
चार-सू घर मैं ढूँढ़ने के लिए
रोज़ रुसवा मकान से निकला
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हमारा इल्म बूढ़ा हो रहा है
किताबें धूल खाती जा रही हैं
किताबें धूल खाती जा रही हैं
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गुज़रते वक़्त के मानिंद है जो
मेरी आँखें उसी को ढूँढती हैं
मेरी आँखें उसी को ढूँढती हैं
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इश्क़ जिस को सभी समझते हैं
वहम है लज़्ज़त-ए-रसाई का
वहम है लज़्ज़त-ए-रसाई का
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उस को फ़िराक़-ए-यार का मतलब नहीं पता
मतलब उसे भी प्यार का मतलब नहीं पता
मतलब उसे भी प्यार का मतलब नहीं पता
मरना तो चाहते हैं मगर क्या करें कि जब
साँसों को इख़्तियार का मतलब नहीं पता
मुझ को भी अब यक़ीन किसी बात पर नहीं
उस को भी एतबार का मतलब नहीं पता
रखते हो तुम हिसाब ग़म-ए-ज़िंदगी का जो
क्या तुम को बेशुमार का मतलब नहीं पता
उस से गिला करें भी अगर हम तो किस लिए
जिस को कि ग़म-गुसार का मतलब नहीं पता
गो कर रहा है गुल की हिफाज़त शजर, मगर
पतझड़ को नौ-बहार का मतलब नहीं पता
अहद-ए-वफ़ा-ए-यार का मतलब पता है पर
बाद-ए-फ़िराक़-ए-यार का मतलब नहीं पता
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थे बदन में क़ैद अपने हम सभी
कुन ख़ुदा ने हम को कह कर खींचा है
कुन ख़ुदा ने हम को कह कर खींचा है
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परिंदा ग़र न उड़ सके नहीं सही
क़फ़स को तोड़ के मरे ख़ुदा करे
क़फ़स को तोड़ के मरे ख़ुदा करे
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