कौन किस की शक्ल में रहता है अब बोलो ज़मीं पर
जानवर की शक्ल में इंसान रहते थे यहीं पर
जानवर की शक्ल में इंसान रहते थे यहीं पर
छीन लो सब कुछ मगर ये याद रखना ओ सितमगर
तुम मिटाओगे जहाँ आसेब उभरेगा वहीं पर
क्यूँ दुआएँ भेज दी जाती हैं वापस आसमाँ से
उन दु'आओं में मिली हैं बद दुआएँ भी कहीं पर
जानते हैं सब कि दामन साफ़ होगा इस लिए भी
देख कर हैरान हैं सब ख़ून मेरे आस्तीं पर
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मिरे दिल से मिटा दो उस परी-रू का निशाँ यारो
ये दरवाज़ा कभी खुलता नहीं उस नाम के रहते
यहाँ अच्छे बुरे का फ़र्क़ आलिम क्यूँ बताएगा
भला इस बे-मुरव्वत बे-ख़िरद आवाम के रहते
ये भी तो मोजज़े से कम नहीं यारो कि ज़िंदा हूँ
वो भी दिन रात हाथों में मुसलसल जाम के रहते
अगर बिजली चमकती है तो बादल भी बरसते हैं
मुझे मालूम है सब ठीक होगा राम के रहते
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लगा कर आग घर में फूलना-फलना तो मुश्किल है
पुरानी छत गिरा कर यार अब चलना तो मुश्किल है
पुरानी छत गिरा कर यार अब चलना तो मुश्किल है
तिरी हर बात गर मैं मान लूँ तो ख़ुद को खो दूँगा
अभी मेरा तिरे इस रंग में ढलना तो मुश्किल है
हरारत है तिरे हाथों में तो छू ले मुझे जल्दी
बिना तेरे छुए इस लाश का जलना तो मुश्किल है
मुक़द्दर में लिखी बातें हमेशा सच नहीं होतीं
मुक़द्दर के भरोसे ही यहाँ चलना तो मुश्किल है
जो तुम ये सोचते हो ज़ुल्म पर हम कुछ न बोलेंगे
तो सुन लो आज इस तूफ़ान का टलना तो मुश्किल है
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बच्चों के हाथों में रख दी अय्यारी टॉफी के बदले
देखो मेरा ही ख़ूँ अब मुझ को छलता है धीरे-धीरे
देखो मेरा ही ख़ूँ अब मुझ को छलता है धीरे-धीरे
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रो रहा है बशर मगर देखो
ज़िन्दगी को रफ़ू नहीं करता
ज़िन्दगी को रफ़ू नहीं करता
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किसी उम्मीद का ये इस्तिआरा जान पड़ता है
कि तन्हा ही सही सच झूट से अब रोज़ लड़ता है
कि तन्हा ही सही सच झूट से अब रोज़ लड़ता है
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उस से कहता हूँ इश्क़ मुहब्बत में रक्खा क्या है
पर अपने दिल को ये मैं कैसे समझाऊँ यारो
पर अपने दिल को ये मैं कैसे समझाऊँ यारो
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देख कर ग़म, मुस्कुराओ गुनगुनाओ, प्यार से तुम
दिल के' इन ज़ख़्मों को' सीने से लगाओ, प्यार से तुम
दिल के' इन ज़ख़्मों को' सीने से लगाओ, प्यार से तुम
प्यार क्या है, रोज़ मिन्नत, रोज़ ख़िदमत, रोज़ ज़िल्लत
जाँ मुझे आग़ोश में अपने समाओ, प्यार से तुम
है गुजारी जा रही रातें तिरी तस्वीर तक कर
यार इस से अब कभी बाहर भी' आओ, प्यार से तुम
सब यहाँ ख़ुद को ख़ुदा कहते, सभी अच्छे भले हैं
दोस्त मुझ को ख़ुश्क पत्तों से मिलाओ, प्यार से तुम
माँ कभी जो सो रहीं हों औ' तन्हा ख़ुद को' पाओ
छोड़ चिंता जल्द मौसी को बुलाओ, प्यार से तुम
हो नहीं पाती मुलाक़ातें मगर खलता नहीं ये
हो सके तो यार अब वापस बुलाओ, प्यार से तुम
मसअला ये है अधूरे रह गयें हैं ख़्वाब मेरे
जीने' ख़ातिर कुछ नए सपने दे' जाओ, प्यार से तुम
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Tarun Pandey
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मुझ को फँसा कर तू चला बहरे जहाँ आराम से
डाला क़फ़स में इक नया अग्यार किस इल्ज़ाम से
डाला क़फ़स में इक नया अग्यार किस इल्ज़ाम से
करता मदारी खेल बंदर की बदौलत शान से
रहता मगर बंदर सदा महरूम जग में नाम से
जो दिख रहा ज़ालिम उसी ने दूसरों के वास्ते
देखो कटा कर रख दिया सर कितने' ही आराम से
फैला कभी था ख़ूँ मिरे आँगन में' हर-सू, यार सुन
औ' ख़ूँ का था वो रंग गाढ़ा भी बहुत गुलफ़ाम से
ये वक़्त क्यूँ मुझ को नहीं मिलता कभी शिरकत करूँ
हल्ला यही है दोस्तों में "ये मरेगा काम से"
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