अकेलापन अकेला छोड़ता तो काम के रहते
भरी महफ़िल में हम जैसे बशर बस नाम के रहते
मिरे दिल से मिटा दो उस परी-रू का निशाँ यारो
ये दरवाज़ा कभी खुलता नहीं उस नाम के रहते
यहाँ अच्छे बुरे का फ़र्क़ आलिम क्यूँ बताएगा
भला इस बे-मुरव्वत बे-ख़िरद आवाम के रहते
ये भी तो मोजज़े से कम नहीं यारो कि ज़िंदा हूँ
वो भी दिन रात हाथों में मुसलसल जाम के रहते
अगर बिजली चमकती है तो बादल भी बरसते हैं
मुझे मालूम है सब ठीक होगा राम के रहते
— Tarun Pandey















