ek vyaapaari sahi sapnon ka saudaagar nahin hooñ | एक व्यापारी सही सपनों का सौदागर नहीं हूँ

  - Tarun Pandey

एक व्यापारी सही सपनों का सौदागर नहीं हूँ
याद रखना मैं किसी की राह का पत्थर नहीं हूँ

आज मेरे साथ चलने को सभी तैयार हैं पर
भीड़ ये कुर्सी से है मैं आप ताक़तवर नहीं हूँ

अब गुज़िश्ता दौर की यादें सताती भी बहुत हैं
ख़ूब पैसे हैं मगर इक दुख कि मैं घर पर नहीं हूँ

झूठ ने हर जंग जीती ख़ामुशी से साथ चलकर
और सच कहता रहा सब से कि मैं घर घर नहीं हूँ

जानता था मैं कि रोना और हँसना ज़िंदगी है
क्या ज़माना था कि सब कहते थे मैं बंजर नहीं हूँ

  - Tarun Pandey

Gham Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Tarun Pandey

As you were reading Shayari by Tarun Pandey

Similar Writers

our suggestion based on Tarun Pandey

Similar Moods

As you were reading Gham Shayari Shayari