jawaani ke dinon men pyaar par qurbaan main aur tum | जवानी के दिनों में प्यार पर क़ुर्बान, मैं और तुम

  - Tarun Pandey

जवानी के दिनों में प्यार पर क़ुर्बान, मैं और तुम
कभी मेरी सभी नज़्मों के' थे उनवान, मैं और तुम

समंदर और तलातुम जैसा ही था साथ दोनों का
सुनामी थी मुक़द्दर में मगर अंजान, मैं और तुम

छतों पर बैठ कर क्यूँ चाँद को तकना मिरे दिलबर
अरे किस पर था' ये चंदा कहो क़ुर्बान, मैं और तुम

कभी मुझ सेे घड़ी भर बात करने को तड़पती थी
कभी थे प्यार में दो जिस्म और यक-जान, मैं और तुम

नज़र से ही गिराना था मुझे तुमको, तुम्हें मुझको
जवानी के दिनों में थे बड़े नादान, मैं और तुम

  - Tarun Pandey

Nature Shayari

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