kisi ummeed ka ye istiaara jaan padta hai | किसी उम्मीद का ये इस्तिआरा जान पड़ता है

  - Tarun Pandey

किसी उम्मीद का ये इस्तिआरा जान पड़ता है
कि तन्हा ही सही सच झूट से अब रोज़ लड़ता है

तशफ़्फ़ी क्यूँ नहीं देता कभी मुझको मिरा बेटा
अरे मेरे गले लगने से उसका क्या बिगड़ता है

ये तो सच है कि दुनिया पागलों ने ही बचाई है
समझदारों के चुप रहने से कितना कुछ उजड़ता है

मुकम्मल करने अपने ख़्वाब निकली है मिरी बेटी
मगर ज़ंजीर से उसको उसी का घर पकड़ता है

ख़ुदा सुन ले मुझे दुनिया से अब कुछ भी नहीं लेना
मिरी ख़ातिर किसी से भी अकेले दोस्त लड़ता है

  - Tarun Pandey

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