मुझ को फँसा कर तू चला बहरे जहाँ आराम से

डाला क़फ़स में इक नया अग्यार किस इल्ज़ाम से

करता मदारी खेल बंदर की बदौलत शान से
रहता मगर बंदर सदा महरूम जग में नाम से

जो दिख रहा ज़ालिम उसी ने दूसरों के वास्ते
देखो कटा कर रख दिया सर कितने' ही आराम से

फैला कभी था ख़ूँ मिरे आँगन में' हर-सू, यार सुन
औ' ख़ूँ का था वो रंग गाढ़ा भी बहुत गुलफ़ाम से

ये वक़्त क्यूँ मुझ को नहीं मिलता कभी शिरकत करूँ
हल्ला यही है दोस्तों में "ये मरेगा काम से"

— Tarun Pandey

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