मैं लड़ाई से तो बच कर के निकल आया था
मुश्त'इल था यूँ कि ग़म ख़ुद पे ही मल आया था
गर्दिश-ए-बख़्त मुझे घेरे हुई थी यारों
हालत-ए-ज़ार से लड़ते हुए बल आया था
डर के रहता था जो दुनिया से किसी कोने में
उस के मरने से ही दुनिया में ख़लल आया था
ज़ेर-ओ-बम तुम ने जो महसूस किया था मुझ
में
वो समझ लो कि मिरा दर्द उछल आया था
झुर्रियाँ देख के माँ की हुई थीं आँखें नम
ये समय रेत सा हाथों से फिसल आया था
— Tarun Pandey















