पीले पत्तों को शाख़ों ने यूँँ झटका है धीरे-धीरे

आबोदाना मुझ बूढ़े को अब तकता है धीरे-धीरे

बच्चों के हाथों में रख दी अय्यारी टॉफी के बदले
देखो मेरा ही ख़ूँ अब मुझ को छलता है धीरे-धीरे

अच्छी लगती हैं बातें उस की जिस से पहले लड़ती थी
लड़ने वाले लड़के पर दिल जा अटका है धीरे-धीरे

देखो होगी आँखें नम तेरी भी मुझ पर हँसने वाले
ये वक़्त बता देगा क्यूँ कोई रोता है धीरे-धीरे

मेरे सपनों को मेरे अपनो ने मारा है जीते जी
मुझ को तो अब उन की नज़रों में गिरना है धीरे-धीरे

— Tarun Pandey

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