काम मैं फ़ालतू नहीं करता
हर समय गुफ़्तगू नहीं करता
करता' तो हूँ शरारतें घर पर
हाँ मगर कू-ब-कू नहीं करता
प्यार तो करता हूँ मैं तुझ सेे ही
पर तिरी आरज़ू नहीं करता
क्यूँ कहूँ प्यार को ज़बर सब सेे
यूँँ ज़बर हाव-हू नहीं करता
नज़्म कहता हसीन तर जो, वो
दोस्त अब गुफ़्तगू नहीं करता
रो रहा है बशर मगर देखो
ज़िन्दगी को रफ़ू नहीं करता
/ तरुण पाण्डेय
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