"मेरी ज़िंदगी तेरे नाम"

रेज़ा रेज़ा मुझे अपनी साँसें फ़क़त तेरे हवाले करनी है
तू जहाँ अपना पैर रखे वहाँ मुझे अपनी जबीं धरनी है
तेरे बाहें मेरे गले का हार हो, तेरी ख़ुश्बू लिखने के अश'आर हो
ऐसे ही मैं जान-ए-ज़िगर जीता रहूँ ऐसे ही ज़िन्दगी पार हो

एक बाग़ सी हसीन होगी अपनी दुनिया
उस
में तेरे मेरे माँ-पापा बरगद के पेड़ जैसे
सब से बूढ़े सब से उम्र-दराज़ और अनुभव
उन के इन्हीं गुण होंगे जैसे उन की शाख़ें
ये शाख़ें पूरे के पूरे बाग़ को छाँव देगी
बाग़ में अपने जज़्बातों के छोटे फूल होंगे
चंद कलियाँ मनचली की होगी जानाँ
तो कुछ कलियाँ दिलबरी की होगी
एक एक फूल अपने जज़्बात से खिलेगा
इतना ज़ियादा इश्क़ तुझे कहाँ मिलेगा
मैं चाहता हूँ अपने मरने के बा'द भी आबाद रहें
ऐसी दास्ताँ हो अपनी कि सब को ज़बानी याद रहें

तेरे जिस्म की हर लकीर को मैं पढूँ
और तू इस पर शान से नाज़ उठाए
सुब्ह तू आइने के सामने खड़ी हो कर
मेरे आगे हाथ में सिंदूर, सूनी माँग लाए
मैं अपने हाथों से तेरी माँग भरूँ
और तू इतनी ख़ूब-सूरत लगेगी
तुझे देख के जहाँ की हर लड़की
सुहागन बनने की दुआ करेगी

रोज़ शाम को मैं तेरा दामन ओढ़ कर सो जाऊँ
ख़ुदा भी तुझ से रश्क करें इतना तेरा हो जाऊँ
मेरी सारी बे-चैनियाँ तुझ से लिपट के सुकूँ हो जाएगी
तेरी सारी परेशानियाँ मैं अपने सर पर तार लूँगा
तू अव्वल तेरा हर दाव, ख़ुशी हर चीज़ मेरे लिए अव्वल
तेरी परेशानियों संग मैं अपनी ज़िंदगी हँसते गुज़ार लूँगा

— Deep kamal panecha

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