Deep kamal panecha

Deep kamal panecha

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Deep kamal panecha shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Deep kamal panecha's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हम ने माँगा फ़क़त अपने हक़ का ही है "दीप" चौखट पे तेरी सवाली नहीं — Deep kamal panecha
अब मैं नहीं जलाता दिया शब अँधेरे में साया तुम्हारा दिखता है मुझ को चराग़ में — Deep kamal panecha
आशिक़ दिवाना मजनूँ या पागल कहो हमें अब और हम बनें तिरे शाइ'र ये दिल करे — Deep kamal panecha
वो पड़े इस बात पे हम सेे उलझ के आज दिन में आपने कैसे तो कैसे सुब्ह दूजा चाँद देखा — Deep kamal panecha
अब मैं नहीं जलाता दीया शब अँधेरे में साया तुम्हारा दिखता हैं मुझ को चराग़ में — Deep kamal panecha
रात भर जगने का उस सेे पूछें सबब आप का कर के दीदार जो सोया हो — Deep kamal panecha
डूब ही जानी है कश्ती रेत के सहरा में भी दोस्त तुम जरा हम-राज़ अपनों को बना कर के तो देखो — Deep kamal panecha
हम तो वो हैं कोई हम को चाहता ही है नहीं चाहते भी हम यही है कोई हम को चाहे ही न — Deep kamal panecha
मुझ को गिराने में यूँँ मशग़ूल मेरे अपने मुझ को गिराते ख़ुद अपने आप गिर गए हैं — Deep kamal panecha
मैं ने माँगा फ़क़त अपने हक़ का ही है 'दीप' तो तेरे दर पे सवाली नहीं — Deep kamal panecha
नज़रों निग़ाहों में उन की बात कुछ तो होगी यूँँ ही शराब इस बामण ने नहीं चखी है — Deep kamal panecha

Ghazal

क्या कहा उन के बिन मैं अच्छा रहूँगा जी नहीं मैं बिल्कुल अधूरा रहूँगा वो अगर बन जाए मिरे दिल के श्री कृष्ण उम्र भर बन मैं उन की राधा रहूँगा चाँद चाहे लाखों मिरी झोली में हो पर मैं तो बस उन का दिवाना रहूँगा वो जुदा जो हो जाएँगे मुझ से तो मैं प्यासे तर्ज़-ए-सहरा तड़पता रहूँगा इक दफ़ा ख़्वाहिश बतला देना मुझे बस रात दिन उस को पूरा करता रहूँगा अपना मुस्तक़बिल मानता हूँ तिरे साथ तेरे बिन जैसे ख़ुद को खोता रहूँगा थाम ले मेरा हाथ तू, सबके आगे साथ, मैं सातो जन्म चलता रहूँगा तुम अभी से चाहे मुझे आज़मा लो अपने वादों का तो मैं पक्का रहूँगा वक़्त इक होने में लगें हम को शायद तेरे ख़ातिर ता उम्र बैठा रहूँगा सौंप के ख़ुद को तू मुझे, कुछ भी कर ले तू न डर, बन के तेरा साया रहूँगा — Deep kamal panecha
मैं उन की निगाहों में जब देखता हूँ तो यूँँ लगता है उन के दिल की दवा हूँ ये क्या इश्क़ से इस क़दर मैं जुड़ा हूँ की जैसे मुकम्मल जहाँ से ख़फ़ा हूँ मुझे मत सँभालो मैं पागल बना हूँ न जाने कहाँ यादों में चल पड़ा हूँ मुझे देखें ही मारों सब पत्थरों से मैं बिन उस के जैसे कोई बद-दुआ हूँ मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मुकम्मल मैं इस लफ़्ज़ का हो गया हूँ मुझे देखो तुम, मत डरो इश्क़ वालो मैं सब हार के जीने का हौसला हूँ किसी ग़ैर का ज़िक्र क्यूँँ करता है तू तुझे क्या नहीं इल्म भी मैं तिरा हूँ कई इस सेे पहले भी बिछड़े थे मुझ से उसे क्यूँँ न खोने की ज़िद पे अड़ा हूँ अगर जिस्म से उस के चाहत है मुझ को तो फिर मास ख़ुद का ही मैं नोचता हूँ या इस बार ये शख़्स मेरा या मैं ख़त्म ऐ मेरे ख़ुदा तुझ को बतला रहा हूँ बुरा हूँ या अच्छा हूँ चाहे जो भी हूँ मगर उस हसीना के दिल का पता हूँ वो घबरा के सीने से लग जाए मेरे शब-ओ-रोज़ तरकीबें ये सोचता हूँ — Deep kamal panecha
कोई न जाने ध्यान उस का बज़्म में किस ओर है कोशिश मगर मेरी तरफ़ करने की तो पुर-ज़ोर है कहना है उस का आपसे मुझ को कोई मतलब नहीं तो फिर नज़र मेरी तरफ़ करने की ये क्या डोर है ये दौलतें ओ शोहरतें ईमान सकती है डुला लेकिन उसी का जो ज़मीर-ओ-ज़ेहन से कमज़ोर है दिल को जमाने से तिजोरी में छुपा के था रखा फिर भी चुरा के ले गया वो कितना आला चोर है वो दूर रहता मुझ से हर दम पास रहने के लिए वो पास रहता है कि ज्यूँँ सागर का दूजा छोर है इक का गला पकड़ा था मैं ने महज़ तेरे ज़िक्र पे अब कहते हैं सब उस का आशिक़ पूरा आदमख़ोर है हम गैर हैं कहते फ़िरो तुम चाहें पूरी दुनिया में पर दुनिया का ये शोर है तू "दीप" की गणगौर है कितनी दफ़ा तुझ को बताऊँ, ख़ुद समझ जा यार अब तू जैसे मैं ख़ुद और तू ही काळजे री कोर है — Deep kamal panecha
तू मुझ से उठ के भी सिर्फ़ मुझ तलक जाए इस में न तू कहीं दुनिया में भटक जाए मैं तेरे हुक्म से इक दुआ ये लूँ क्या माँग तेरी ख़ुशी मिरी बाहों में अटक जाए मैं जब मरूँ तो मेरे गले न लगते तुम धड़कन कहीं न ये मेरी फिर धड़क जाए मैं उम्र भर फिरूँ ढूँढ़ता ख़ुशी मेरी मेरी ख़ुशी तिरी ज़ुल्फ़ों में भटक जाए बरसाता मैं ही बस कब तलक रहूँगा प्यार दो बूँद तेरी आँखें से भी झलक जाए वो मेरी मूँछ का काश रख ले थोड़ा मान उस लड़के से जरा दूर उठ सरक जाए बैठा रहूँगा अपना कलेजा था में मैं वो गीली ज़ुल्फ़ें गर चेहरे पर झटक जाए जानाँ निकाल लो मेरी जाँ इजाज़त है लेकिन कभी मिरे इश्क़ पे न शक जाए इस बार थोड़ा सा भी बहक न जाना तुम तुम को सँभालते "दीप" ये न थक जाए — Deep kamal panecha
मुहब्बत गर मुक़म्मल होती तो क्या ग़म थे दुनिया में सभी चाहें हमें इतने गुरूरी हम थे दुनिया में बना है या बना था या बनेगा ही नहीं वो शख़्स हज़ारों लाखों में तन्हा अकेले हम थे दुनिया में किसी छलनी हुए दिल की नहीं कोई दवा भी याँ बदन पर आए ज़ख़्मों के कई मरहम थे दुनिया में पड़ा है ज़ख़्मी, बेबस और तन्हा ये है हाल-ए-दिल दुआ कोई करें ही क्यूँ कि अपने कम थे दुनिया में हमारे ज़ख़्मी दिल को यूँँ ही अपनी रेहन में रक्खा तो कुछ ऐसे भी आदम हो रखें दरहम थे दुनिया में बड़ी मक़बूल थी तन्हाइयाँ रुसवाइयाँ हम को फ़क़त ये ही हमारे पास कुछ हमदम थे दुनिया में — Deep kamal panecha
सितारे भी जान आप हैं माहताब भी आप ही हैं जानाँ मिले शब-ओ-रोज़ मेरे दिल को वो ख़्वाब भी आप ही हैं जानाँ ये आप हैं महज़ आप दिल के मिरे मोहल्ले में रहते हैं जो फ़क़ीर भी जान आप हैं याँ नवाब भी आप ही हैं जानाँ अगर मुझे पूछे कोई क्या कौन आप हैं मेरे तो कहूँगा सुकून भी दिल का आप हैं इज़्तिराब भी आप ही हैं जानाँ न आरज़ू मेरी दरिया है मेरी जुस्तजू भी नहीं है सहरा तो प्यास भी दिल की आप हैं जानाँ आब भी आप ही हैं जानाँ मैं प्यास का मारा हूँ पिलाओ ये आप हैं समझा कर के कुछ भी मेरे लिए आप ही हैं अमृत शराब भी आप ही हैं जानाँ — Deep kamal panecha
मैं ने की जिस सेे मुहब्बत वो शख़्स था तू क्या तो तुझ से इश्क़ में नफ़रत है दूजा पहलू क्या ये बे-करार हो उठता है दिल पलक भर में तो घोंप लूँ मैं कलेजे में अपने चाकू क्या मैं जी रहा हूँ बिछड़ने के बा'द भी उस सेे मैं समझूँ इस को तो क्या समझूँ कोई जादू क्या यूँँ बैठे बैठे मुसलसल ख़याल तेरा ही आ जाती है मिरे अंदर को तेरी ख़ुश्बू क्या ये क्या ग़ज़ल कभी नज़्में कभी, कभी नुसरत उठा दिया हैं मिरे दिल ने ख़ुदस क़ाबू क्या ख़मोश बैठा नहीं जाता बे-करारी में तो पूरी दुनिया में करता फिरूँ मैं हा हूँ क्या ज़मीर माने नहीं कोई ग़ैर को देखूँ जो रोकती है मुझे वो है तेरी ख़ुश्बू क्या विसाल-ए-ग़ैर जचा ख़ूब हार मोती का हर एक हार का मोती था मेरा आँसू क्या बनाने दूरी लगे हो किसी को जाने को तो प्यार से वो भी तुम को कहेगा मोटू क्या — Deep kamal panecha
जाने कितनी शबें जगा हूँ मैं नींद को बतला दो ख़फ़ा हूँ मैं पूरी शब सोच में गुज़रती है क्यूँ फ़क़त तुम को सोचता हूँ मैं ज़िन्दगी जीना थोड़ा तो सिखा दें देख,अरसे से मर रहा हूँ मैं दिल में कोई मुझे नहीं रखता जी यक़ीनन बहुत बुरा हूँ मैं आप कोशिश न जानने की करें जीते जी मरने की अदा हूँ मैं और नफ़रत से देखो तुम मुझ को मेरी जान-ए-जिगर तिरा हूँ मैं ज़ख़्मों से इतना प्यार है मुझ को बे-सबब ज़ख़्म ढूँढ़ता हूँ मैं ज़िंदा हो जाऊँ, गर वो आए पलट वर्ना ऐसे मरा हुआ हूँ मैं इस क़दर इश्क़ है मुझे उस सेे चिल्ला चिल्ला के बोलता हूँ मैं उस सेे अपना कोई नहीं मेरा वास्ते उस के दूसरा हूँ मैं सारे नफ़रत ही करते है मुझ से हाए रब की हसीं ख़ता हूँ मैं — Deep kamal panecha
नींद से क्यूँ मिरी दुश्मनी हो गई ऐसी कैसी मुझे दिल-लगी हो गई इस तरह ख़ुद को उस में मिला बैठा मैं पूरी दुनिया ही ये अजनबी हो गई सारी दुनिया से किस तर्ज़ पर मैं लड़ूँ उस के ही साथ में जब कमी हो गई है मिरी नींदों का बस उसी से वुजूद उस के बिन ये भी नाराज़ सी हो गई मैं ने आँखें डुबों दी गले माँ से लग माँ की आँखों में भी फिर नमी हो गई मैं ने तो गुफ़्तगू उस सेे यूँँ ही की थी जाने कब वो मिरी ज़िन्दगी हो गई उस के आगे मैं सर भी झुका लेता हूँ रब की मानों यहीं बंदगी हो गई हाँ लिया देख सब कुछ दुबारा मैं ने उस की सब ग़ज़लों में हाज़िरी हो गई इतना कस के लगा उस के सीने से मैं उस की, अंदर मिरे ख़ुशबू सी हो गई — Deep kamal panecha
मेरे घर के दर से कोई ख़फ़ा न जाएगा सो बुरा तो क़ातिल को भी कहा न जाएगा तुम से इश्क़ है हम को अब करा न जाएगा दूर तुम से या फिर हम से रहा न जाएगा मैं जो तुझ से कहता हूँ वो ग़ज़ल से समझा कर साफ लफ़्ज़ से तो मुझ से कहा न जाएगा शख़्स वो मुसलसल ज़िक्र-ए-रक़ीब करता है अंजुमन में पहलू उस के रुका न जाएगा मैं जहाँ का हर ग़म सहता हूँ ये भी क्या कम है उस पे तेरा ग़म बिल्कुल भी सहा न जाएगा देख जाने वाले हम को गले लगाता जा यूँँ फ़ुज़ूल फ़ुर्क़त में अब जला न जाएगा आप ही मिरा करते जावे क़त्ल, बेहतर है वक़्त या मुख़ालिफ़ से तो मरा न जाएगा इश्क़ हो मुहब्बत हो प्यार हो या फिर उलफ़त मर्तबा मुसलसल माइल करा न जाएगा एक जाम तुम से उल्फ़त की हम ने पी ली है और ज़हर ये हम से अब पिया न जाएगा एक दौर से तुम को ढूँढ़ते रहे हैं हम दीप कूचे कूचे अब तो फिरा न जाएगा — Deep kamal panecha
ज़ख़्म-ए-इश्क़ यूँँ लगता है ख़ुदारा है या ख़ुदा का कोई जैसे इशारा है मैं तुम्हारा ही सौदाई हूँ अब भी बस बाक़ी पूरी ही दुनिया से किनारा है जान भी नहीं है अब मेरे दिल में तो जान, जान बिन भी ये दिल तुम्हारा है मशवरा है मेरा टुक सोचना भी मत कैसा और क्या उल्फ़त में ख़सारा है तह से तर तलक का सारा का सारा है और जो ख़सारा है बस हमारा है मैं जिऊँ न तेरे बिन एक आन भी और तेरे बिन भी मेरा गुज़ारा है ताकते मैं रहता हूँ उस को पूरी रात एक दूर बेहद वो जो सितारा है है गुलाब के जैसा उन का आरिज़ मेरे यार वो ज़ालिम इतना प्यारा है उस को देखा पलकें भर कर के मैं ने जब यूँँ लगा मुक़म्मल जन्नत नज़ारा है अब नहीं रही चाहत मुझ को कोई भी जब से दिल ये मेरा उल्फ़त में हारा है छू न पाए कोई हथियार भी मुझे उस की नज़रों ने पर धो धो के मारा है आता है कहाँ करना "दीप" को सुख़न ये ख़यालों का बस उस के सहारा है — Deep kamal panecha
प्यार तुम से मुझे हो गया, क्या करूँँ दिल ये मेरा न बस में रहा, क्या करूँँ आज शब जैसे तैसे बसर कर लूँ मैं पर बसर आज शब करने का, क्या करूँँ फोड़ लूँ सर या ख़ुद को करूँँ मैं तबाह कैसे इक दम जि यूँँ मैं बता, क्या करूँँ ज़िंदगी मुझ को उस बिन नहीं है क़ुबूल मुझ से है पर वो पूरा खफ़ा, क्या करूँँ छोड़ जाना मुझे चाहता है वो शख़्स इस क़दर मुझ से है मुब्तला, क्या करूँँ चीर कर दिल लहू से लिखूँ उस का नाम इश्क़ में उस सेे ये इब्तिदा, क्या करूँँ रूह दिल अंदरूँ सब तुझे दे दिए इश्क़ दिखलाने को और क्या, क्या करूँँ बेकसी में कहाँ किस के मैं जाऊँ पास हो गया वो तो मुझ से जुदा, क्या करूँँ ज़िन्दगी ख़ूब-सूरत बहुत है मगर पस्त है जीने का हौसला, क्या करूँँ अपनी ही ख़ामी से उस को हारा है "दीप" पूरा बर्बाद अब हो चुका, क्या करूँँ — Deep kamal panecha
दबी हुई चंद ख़्वाहिशों पे रही है चल ज़िन्दगानी मेरी मिरे अज़ीज़ों की साज़िशों पे रही है चल ज़िंदगानी मेरी तमन्ना किस को है ज़िन्दगानी की, मौत का भी है खौफ़ किस को सो ज़ख़्मों की ही नवाज़िशों पे रही है चल ज़िंदगानी मेरी सुने कहाँ कोई मुझ को, आँखों तलक भी आँसू नहीं है आता कलाम करने की वर्ज़िशों पे रही है चल ज़िंदगानी मेरी भरा हुआ है मिरी निग़ाहों में इक समुंदर के जितना ही दुख हँसाने-हँसने की कोशिशों पे रही है चल ज़िंदगानी मेरी दुखों के बिन ज़िन्दगानी जीने में, अब मुझे होता है बहुत दुख यूँँ समझो ख़ुशियों से, रंज़िशों पे रही है चल ज़िंदगानी मेरी सुख़न मिरी ज़िन्दगी, मुझे और कुछ कहाँ आता है सुख़न में तिरे बदन की सताइशों पे रही है चल ज़िंदगानी मेरी — Deep kamal panecha
बना रखता यूँँ तो वो दिल को पत्थर है मगर मुझ को तो कहता आप का घर है वो लड़की इक तो बेहद ख़ूब-सूरत है कमर का उस का तिल ऊपर से सुंदर है मैं उस सेे मिलने को बेताब रहता हूँ किलोमीटर मगर सौ पूरे पर घर है मुहब्बत के हमारी क्या ये मंज़र हैं कभी गुल तो कभी हाथों में ख़ंजर है यहाँ तय्यार हूँ मैं मरने को या रब खड़ा लेकिन कहाँ तो उस का लश्कर है हैं हम घाइल न छेड़े कोई भी हम को हमारे सीने में लौ आँख ख़ूँ तर है गुज़ारिश लोग करते उन पे लिखने की मगर ये 'दीप' बस तेरा ही शाइ'र है सँभालूँ किस को मैं किस को कहाँ रक्खूँ ये तर्ज़-ए-इश्क़ मेरी ज़ीस्त अबतर है फ़क़त बर्बाद था मैं हूँ रहूँगा भी चलों मत साथ तुम मेरे तो बेहतर है — Deep kamal panecha
दिल-ओ-जाँ मेरे सब कुछ छोड़ जाने को जी करता है नदी इक आग की में दिल डुबाने को जी करता है मुझे इक इक मिरा अरमाँ जलाने को जी करता है ख़ुदा अब पास तेरे मेरा आने को जी करता है मैं अपने नाख़ुनों से नोच लूँ ख़ुद अपना ही सीना मियाँ यूँँ ख़ून ख़ुद अपना बहाने को जी करता है नहीं ख़्वाहिश मुझे अब जीने की जी भर गया सब से मुझे ख़ुद ही मिरी मय्यत सजाने को जी करता है नहीं है अब यक़ीं इन पे मुझे कहते हैं जो अपना मुझे अब लाश अपनी ही उठाने को जी करता है कई बरसों लड़ा मैं ज़िन्दगी से दुख ही दुख आए मिरा अब ज़िन्दगी से हार जाने को जी करता है कई मुद्दत से सारे रंज आँखों में सँभाले हूँ सो आँखें नोच के अब मर ही जाने को जी करता है — Deep kamal panecha

Nazm

"बीच राह" सर्द मौसम और ये राहें अकेली और कब तेरी ज़रूरत होगी सहेली मैं चलता चलता हाथ फैलाता हूँ तेरा हाथ मेरे हाथ में नहीं पाता हूँ फिर होश में आता हूँ घबराता हूँ बीच राहों में रुक के बैठ जाता हूँ कुछ सोच कुछ ख़याल आते रहते हैं ज़िन्दगी के सारे मलाल आते रहते हैं बैठा-बैठा इंतिज़ार करता हूँ तेरा ज़िक्र बार-बार करता हूँ रुक सा गया हूँ थम सा गया हूँ अब तो ख़ुद को भी खो चुका हूँ रोने के लिए आँख में आँसू नहीं पर गला मेरा ख़ूब चीख़ता है तू ही बतला दे मुझ को ऐ सहेली ये दर्द नहीं आख़िर तो और क्या है गर्दन बीच घुटनों में हौसला पस्त और तू वहाँ बैठा है हो के मस्त मैं किसी को ख़बर कर भी नहीं सकता बीच सारे राह में मर भी नहीं सकता ये ज़िंदगी का सफ़र है और मौत मंज़िल तय तो हर हाल में करना पड़ेगा और तेरे बग़ैर ऐ सहेली मुझे मंज़िल पाने के वास्ते अभी मरना पड़ेगा — Deep kamal panecha
"पुराना ज़ख़्म" आज बरसों बा'द उन का दीदार हुआ दिल को फिर इश्क़ पे ए'तिबार हुआ आँखों में नए ख़्वाब जगे हैं अभी भी अरमानों के दाग़ हरे हैं एक तरफ़ा मुहब्बत यूँँ शादाब भी होती है मुकम्मल न हो तो भी आबाद भी होती है उन की ज़ुल्फ़ों के साए मैं क़ैद रहे ये दिल मेरा दिन-ओ-रात बेचैन रहे मैं चाहता हूँ मोहब्बत का घर हो उन की निग़ाहों का जादुई असर हो उन की हसरत उन का अरमान हो उन की ज़ुल्फ़ों का आसमान हो हम दोनों हम-आग़ोश हो किसी को न ज़माने का होश हो ये चाँदनी रात हो हाथों में हाथ हो हल्की हल्की इश्क़ की बरसात हो इस की कभी सुब्ह न होने पाए ग़म कभी हमारे घर न आए मैं अपनी उँगलियों को उन के गुलाबी रुख़सारों पे फहराऊँ ख़ुदा करें मैं इस ख़्वाब-ओ-ख़्याल से कभी बाहर न आऊँ उन के एक पल के दीदार में मैं ने इतना कुछ सोच लिया आज फिर दिल के पुराने ज़ख़्म को ख़रोंच लिया — Deep kamal panecha
"मेरी ज़िंदगी तेरे नाम" रेज़ा रेज़ा मुझे अपनी साँसें फ़क़त तेरे हवाले करनी है तू जहाँ अपना पैर रखे वहाँ मुझे अपनी जबीं धरनी है तेरे बाहें मेरे गले का हार हो, तेरी ख़ुश्बू लिखने के अश'आर हो ऐसे ही मैं जान-ए-ज़िगर जीता रहूँ ऐसे ही ज़िन्दगी पार हो एक बाग़ सी हसीन होगी अपनी दुनिया उस में तेरे मेरे माँ-पापा बरगद के पेड़ जैसे सब सेे बूढ़े सब सेे उम्र-दराज़ और अनुभव उन के इन्हीं गुण होंगे जैसे उन की शाख़ें ये शाख़ें पूरे के पूरे बाग़ को छाँव देगी बाग़ में अपने जज़्बातों के छोटे फूल होंगे चंद कलियाँ मनचली की होगी जानाँ तो कुछ कलियाँ दिलबरी की होगी एक एक फूल अपने जज़्बात से खिलेगा इतना ज़ियादा इश्क़ तुझे कहाँ मिलेगा मैं चाहता हूँ अपने मरने के बा'द भी आबाद रहें ऐसी दास्ताँ हो अपनी कि सब को ज़बानी याद रहें तेरे जिस्म की हर लकीर को मैं पढूँ और तू इस पर शान से नाज़ उठाए सुब्ह तू आइने के सामने खड़ी हो कर मेरे आगे हाथ में सिंदूर, सूनी माँग लाए मैं अपने हाथों से तेरी माँग भरूँ और तू इतनी ख़ूब-सूरत लगेगी तुझे देख के जहाँ की हर लड़की सुहागन बनने की दुआ करेगी रोज़ शाम को मैं तेरा दामन ओढ़ कर सो जाऊँ ख़ुदा भी तुझ सेे रश्क करें इतना तेरा हो जाऊँ मेरी सारी बे-चैनियाँ तुझ सेे लिपट के सुकूँ हो जाएगी तेरी सारी परेशानियाँ मैं अपने सर पर तार लूँगा तू अव्वल तेरा हर दाव, ख़ुशी हर चीज़ मेरे लिए अव्वल तेरी परेशानियों संग मैं अपनी ज़िंदगी हँसते गुज़ार लूँगा — Deep kamal panecha
इकरार तन्हाई में हम ने दिन गुज़ारे हैं अब हम आपसे पूछते हैं क्या आप हमारे हैं हम तो हुकुम यहाँ मौजूद भी नहीं फिर आपने किस के लिए बाल सँवारे हैं गुज़ारे हैं जैसे हम ने ये सुब्ह-ओ-शाम क्या कभी आपने भी गुज़ारे हैं चाँद तारे सितारे शब ठण्डी हवा और तिरा शाइ'र मुझे तड़पाने रुलाने घुटाने आते सारे हैं पल पल मिल कर पल पल खोने वाले ग़ैर की बाहों में हसीं रात बन के सोने वाले रुलाने वाले तेरे अज़ाब हैं और फ़क़त तेरा मेरे सामने ही हिज़ाब हैं कुछ तो भरम रख सुक़ून-ए-मुहब्बत का या थोड़ा करम रख सुक़ून-ए-मुहब्बत का दिल को चैन नहीं आराम नहीं मुहब्बत का ये तो काम नहीं जिस दर्ज़ा मैं हुआ हूँ बर्बाद उस दर्ज़ा तो कोई बर्बाद नहीं मैं मुसलसल इल्तज़ा करता रहा मेरे इज़हार-ए-यार को तरसता रहा इज़हार आया ना मगर वो पराया ना मैं अपनी अना पे पैहम चोट कर रहा हूँ पर नहीं "दीप" अब ख़ुदाया ना ये जो भी सानेहा हुआ मेरा साथ मुश्किल आप चारों ने ही किया हैं मुझे काइल तू, तेरी बातें, तेरा शाइ'र, मेरा दिल अब ख़याल हैं मेरा, शायद तू नहीं मेरे काबिल अब ख़ुदा तेरा सहारा हैं, मुझे वो शख़्स दे या इन चारों की ग़लती से मुझे बख्श दे तुम से दूर रह कर, मैं ने इतना लिखा हैं तो सोच एक दफ़ा तेरे पास हुआ तो क्या क्या कर दूँगा आग लगा दूँगा तेरे इज़हार के बा'द तो सनम मैं दुनिया भुला दूँगा — Deep kamal panecha
"मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा" तुम से जुदाई हुई तो मैं मर जाऊँगा तुम से उठ कर के मैं किधर जाऊँगा जाऊँगा इधर उधर पागल की तरह याद करूँँगा सारे लम्हें वो पल वो दिन जो हम ने अकेले में साथ में बिताए हैं क्या कैसे बयाँ करूँँ कुछ समझ नहीं आता तुझ से दूर जाने का ख़याल तक सहा नहीं जाता मैं क्या बताऊँ तुम क्या हो मेरी कब तक इन ख़्यालों में मरना होगा कब होगा ऐसा जब हम दो ही होंगे कब होगा ऐसा कि बस ज़िंदगी होगी क्या होगा ऐसा कि हँसी-ख़ुशी होगी ये क्या समाज है ये कैसा समाज है जो किसी की ख़ुशी नहीं देख सकता ऐसे समाज से हमें क्या चाहिए और क्या दे भी सकता है ये कुछ हमें मुझे तेरे इलावा कुछ नहीं चाहिए तू बस मेरी हो जान, ये यक़ीं चाहिए मैं तेरे बिना जैसे तबाह हो जाऊँगा पागलों की तरह राह की धूल खाऊँगा क्या करूँँगा कुछ ख़बर नहीं होगी मुझे पीड़ा के इलावा कुछ असर नहीं होगी मुझे तेरी शादी या'नी मौत होगी मेरी जिस पर तेरे अपने शान से नाचेंगे मिठाई बाँटी जाएँगी मौज उड़ाएँ जाएँगे सब लोग शान से जश्न मनाएँगे और मेरे अपने मुझे बचाएँगे मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा बिन तेरे राह की धूल खाऊँगा — Deep kamal panecha
"तबाह" कुछ ख़ामी तो मुझ में है ही ऐसे तो कोई तन्हा नहीं करता ज़ख़्म अता नहीं करता ख़ुदस जुदा नहीं करता मैं ने तो अब तक किसी को सताया नहीं किसी को रुलाया नहीं फिर क्यूँँ कोई मुझ से वफ़ा नहीं करता दाग़ ही दाग़ हैं मेरे जिस्म पर चाक गिरेबाँ का मैं बस इसी लिए कोई मुझ से गिला नहीं करता हसीं ख़्वाब सी गुज़ारनी चाहिए ज़िन्दगी दोज़ख़ सी गुज़ार रहा हूँ मेरी इबारत के हर हर्फ़ को सीने पर लहू से उतार रहा हूँ गुज़ार रहा हूँ बुराई में तन्हाई में रुसवाई में परछाई में आख़िरश यही लिखा है क्या मेरी ज़िंदगी की रौशनाई में ख़्वाब हक़ीक़त नहीं पर मैं समझता हूँ तेरे बिना ही सही ज़िंदा तो रहता हूँ रहता हूँ ख़ामोश कोई आरज़ू कोई जुस्तजू नहीं करता तेरे साए के सिवा अब मैं किसी से गुफ़्तगू नहीं करता कब तक ख़्वाब की आरज़ू पर ज़िन्दगी चलेगी कब तक साए से गुफ़्तगू रहेगी ये बहुत लम्बा वक़्त हो चुका है अब जान-ए-जाँ तेरे लौट आने का वक़्त हो चुका है कुछ तो मेरा ख़याल कर या मुझ सेे कोई सवाल कर बस इतना कमाल कर आ गले लगा और तबाह कर — Deep kamal panecha
"तुम चाँद" हमारी मोहब्बत का रिश्ता है कुछ इस तरह ज़मीं से फ़लक की ओर जाने वाले रस्ते की तरह ये रास्ता जो दिखाई ना देता है मैं इस की तलाश में फिरता हूँ कभी मय-खाने से गुज़रता हूँ तो कभी इबादतों में रहता हूँ तुम फ़लक पे क़ाएम हो मैं ज़मीन पर रहता हूँ सुब्ह हज़ारों काम होते हैं मुझे रातों में तेरे दीदार को मरता हूँ तुम्हारी और मेरी रातों में फ़र्क़ होता है तुम तो सुकूँ के साथ हो जाते हो मुझे इस लफ़्ज़ के मायने भी नहीं पता ये सब तुझ से उल्फ़त की है ख़ता खूँ-ए-दिल के साथ तुम को मैं चाँद कहता हूँ वफ़ा और बे-वफ़ाई का याँ कोई मसअला नहीं तुम यहाँ सब के लिए ही तो आते हो निकलते हो और ये कहते हैं तेरा मेरे इलावा किसी से वास्ता नहीं इन सब को भरम हैं कि तुम सिर्फ़ मेरे हो चुके हो इन्हें रक़ीब का नहीं पता तुम तो मुझ से खो चुके हो — Deep kamal panecha
"मुलाक़ात" पहली मुलाक़ात में खामियाँ थी कुछ क़िस्से थे कुछ कहानियाँ थी तुम्हें पता था कि हम हैं हसीं होने वाले कुछ ग़म हैं ज़रा तो सज सँवर कर आती जान काश कुछ पल और ठहर जाती तेरे दिल में सवालो के काफिले थे मुझे भी ज़वाब उन के कहाँ मिले थे तेरे ज़ेहन को तसल्ली नहीं मिली होगी हाँ मेरे ज़वाबो में ही कमी कोई रही होगी उस के बा'द कही तो नज़र आती जान काश कुछ पल और ठहर जाती कुछ मैं ने फरमाया था कुछ आपने इतराया था तेरे हर सवाल पे दिल एक बार तो घबराया था बे-मतलब फ़ुज़ूल ही हम इस दुनिया से डरते है छुप-छुप कर इक दूसरे के ख्यालो में मिलते है थोड़े से और वक़्त पे मुलाक़ात निखर आती जान काश कुछ पल और ठहर जाती कमियाँ किस शख़्स में नहीं होती तुझ में नहीं होती या मुझ में नहीं होती शायद तुझे मैं अपना बना लेता कुछ अधूरे से सपने सजा देता इक बार तो मेरे ख़्वाबों के घर आती जान काश कुछ पल और ठहर जाती — Deep kamal panecha
"रंजिशें" बात क्या हुई क्या ख़बर क्या हुई हम सेे यूँँ ही अपने खफ़ा हो चले हैं जिन्हें देखते हैं हम उम्मीद भरी निगाहों से उन की नज़र में हम फ़ना हो चले हैं कुछ हम सेे इल्तज़ा कर दे ऐ जाने वाले या गीले शिकवे बयाँ कर दे सताने वाले अयाँ कर दे सारी ख़ामियाँ, सारी ख़ामोशियाँ बता दे सारे क़िस्से दास्ताँ कहानियाँ कुछ तो हुआ होगा किसी ने कुछ कहा होगा ऐसे ही कोई अपना रवैया नहीं बदलता ख़ामोश नहीं रहता, उदास नहीं चलता कुछ पता ही नहीं कैसे क्या दूर करूँ गीले-शिकवे तू बेहद अजीज़ हैं मेरे, दिल से हैं तुझ से रिश्ते जाना मेरी, तू पेश कर अपनी नाराज़ियों का सबब मैं दूर कर दूँगा सारी रंजिशें अभी आज़ और अब — Deep kamal panecha