"ख़्वाब"
ये ख़्वाब मुझे क्यो आते हैँ
पल-पल मुझे तड़पाते हैं
तुम मेरे सपनों में आती हो
फिर सारी रात जगाती हो
इब्तिदास इंतिहाँ तक
क़िस्से से दास्ताँ तक
मैं महज़ तुम्हारा हूँ
और सारा का सारा हूँ
तुम न जाने किस की हो
मैं इस सोच में डूबा रहता हूँ
तेरी ना-मौजूदगी का एहसास
और हज़ारो बेचैनियाँ सहता हूँ
बुरे वक़्त में मैं तुझे हासिल नहीं था
मेरे सजना मैं इस काबिल नहीं था
वो बेबसी और मजबूरी इस तरह थी
मैं वो दरिया जिस का साहिल नहीं था
— Deep kamal panecha















