"तुम चाँद"

हमारी मोहब्बत का रिश्ता है कुछ इस तरह
ज़मीं से फ़लक की ओर जाने वाले रस्ते की तरह

ये रास्ता जो दिखाई ना देता है
मैं इस की तलाश में फिरता हूँ
कभी मय-खाने से गुज़रता हूँ
तो कभी इबादतों में रहता हूँ

तुम फ़लक पे क़ाएम हो
मैं ज़मीन पर रहता हूँ
सुब्ह हज़ारों काम होते हैं मुझे
रातों में तेरे दीदार को मरता हूँ

तुम्हारी और मेरी रातों में फ़र्क़ होता है
तुम तो सुकूँ के साथ हो जाते हो
मुझे इस लफ़्ज़ के मायने भी नहीं पता
ये सब तुझ से उल्फ़त की है ख़ता

खूँ-ए-दिल के साथ तुम को मैं चाँद कहता हूँ
वफ़ा और बे-वफ़ाई का याँ कोई मसअला नहीं
तुम यहाँ सब के लिए ही तो आते हो निकलते हो
और ये कहते हैं तेरा मेरे इलावा किसी से वास्ता नहीं

इन सब को भरम हैं कि तुम सिर्फ़ मेरे हो चुके हो
इन्हें रक़ीब का नहीं पता तुम तो मुझ से खो चुके हो

— Deep kamal panecha

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