दिल-ओ-जाँ मेरे सब कुछ छोड़ जाने को जी करता है

नदी इक आग की में दिल डुबाने को जी करता है

मुझे इक इक मिरा अरमाँ जलाने को जी करता है
ख़ुदा अब पास तेरे मेरा आने को जी करता है

मैं अपने नाख़ुनों से नोच लूँ ख़ुद अपना ही सीना
मियाँ यूँ ख़ून ख़ुद अपना बहाने को जी करता है

नहीं ख़्वाहिश मुझे अब जीने की जी भर गया सब से
मुझे ख़ुद ही मिरी मय्यत सजाने को जी करता है

नहीं है अब यक़ीं इन पे मुझे कहते हैं जो अपना
मुझे अब लाश अपनी ही उठाने को जी करता है

कई बरसों लड़ा मैं ज़िन्दगी से दुख ही दुख आए
मिरा अब ज़िन्दगी से हार जाने को जी करता है

कई मुद्दत से सारे रंज आँखों में सँभाले हूँ
सो आँखें नोच के अब मर ही जाने को जी करता है

— Deep kamal panecha

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