मेरे घर के दर से कोई ख़फ़ा न जाएगा

सो बुरा तो क़ातिल को भी कहा न जाएगा

तुम से इश्क़ है हम को अब करा न जाएगा
दूर तुम से या फिर हम से रहा न जाएगा

मैं जो तुझ से कहता हूँ वो ग़ज़ल से समझा कर
साफ लफ़्ज़ से तो मुझ से कहा न जाएगा

शख़्स वो मुसलसल ज़िक्र-ए-रक़ीब करता है
अंजुमन में पहलू उस के रुका न जाएगा

मैं जहाँ का हर ग़म सहता हूँ ये भी क्या कम है
उस पे तेरा ग़म बिल्कुल भी सहा न जाएगा

देख जाने वाले हम को गले लगाता जा
यूँ फ़ुज़ूल फ़ुर्क़त में अब जला न जाएगा

आप ही मिरा करते जावे क़त्ल, बेहतर है
वक़्त या मुख़ालिफ़ से तो मरा न जाएगा

इश्क़ हो मुहब्बत हो प्यार हो या फिर उलफ़त
मर्तबा मुसलसल माइल करा न जाएगा

एक जाम तुम से उल्फ़त की हम ने पी ली है
और ज़हर ये हम से अब पिया न जाएगा

एक दौर से तुम को ढूँढ़ते रहे हैं हम
दीप कूचे कूचे अब तो फिरा न जाएगा

— Deep kamal panecha

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