
फ़ुर्सत नहीं मुझे कि करूँँ इश्क़ फिर से अब
माज़ी की चोटों से अभी उभरा नहीं हूँ मैं
डर है कहीं ये ऐब उसे रुस्वा कर न दे
सो ग़म में भी शराब को छूता नहीं हूँ मैं
— Harsh saxena
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