ज़ख़्म-ए-इश्क़ यूँँ लगता है ख़ुदारा है

या ख़ुदा का कोई जैसे इशारा है

मैं तुम्हारा ही सौदाई हूँ अब भी बस
बाक़ी पूरी ही दुनिया से किनारा है

जान भी नहीं है अब मेरे दिल में तो
जान, जान बिन भी ये दिल तुम्हारा है

मशवरा है मेरा टुक सोचना भी मत
कैसा और क्या उल्फ़त में ख़सारा है

तह से तर तलक का सारा का सारा है
और जो ख़सारा है बस हमारा है

मैं जिऊँ न तेरे बिन एक आन भी
और तेरे बिन भी मेरा गुज़ारा है

ताकते मैं रहता हूँ उस को पूरी रात
एक दूर बेहद वो जो सितारा है

है गुलाब के जैसा उन का आरिज़
मेरे यार वो ज़ालिम इतना प्यारा है

उस को देखा पलकें भर कर के मैं ने जब
यूँ लगा मुक़म्मल जन्नत नज़ारा है

अब नहीं रही चाहत मुझ को कोई भी
जब से दिल ये मेरा उल्फ़त में हारा है

छू न पाए कोई हथियार भी मुझे
उस की नज़रों ने पर धो धो के मारा है

आता है कहाँ करना "दीप" को सुख़न
ये ख़यालों का बस उस के सहारा है

— Deep kamal panecha

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